
वितर्कविचारानन्दास्मिताऽनुगमात्सम्प्रज्ञातः ।
वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्= वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता — इन चारों के सम्बन्ध से युक्त {चित्त वृत्ति का समाधान} सम्प्रज्ञात:= सम्प्रज्ञातयोग है ।
अनुवाद– वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता इन चारों के सम्बन्ध से युक्त चित्त वृत्ति का समाधान सम्प्रज्ञात योग {समाधि} है ।
व्याख्या– इस समाधिपाद में महर्षि पतंजलि ने सर्वप्रथम योग की परिभाषा देते हुए कहा है की चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है ।
जब इंद्रियों के ग्राह्य पदार्थों के स्थूल रूपों का तो निरोध हो जाता है किंतु इसका विकल्प शब्द, अर्थ और ज्ञान बना रहता है इस प्रकार की समाधि को सवितर्क समाधि कहते हैं ।
जब इन स्थूल ग्राह्य पदार्थों के विकल्प शब्द, अर्थ और ज्ञान का भी निरोध हो जाता है तो उसे निर्वितर्क समाधि कहते हैं इन्हीं को सविकल्प तथा निर्विकल्प समाधि भी कहते हैं ।
इसके बाद बाहर से संग्रहीत विचारों का क्रम तो बंद हो जाता है किंतु स्वयं के भीतर ही भीतर विचार चलते रहते हैं तथा निर्णय भीतर से ही आना आरम्भ हो जाता है इसे ‘विचार’ कहा जाता है ।
सही तर्क से विचार आते हैं । यह वरदान है जिससे सत्य का पता चलता है कुतर्क वाला नकारात्मक {नेगेटिव} होता है । वह हर वस्तु का विरोध करने लगता है तथा अपनी ही बात को सत्य सिद्ध करने का दुराग्रह करता है । वह अहंकारी होता है हर बात के इनकार करने से उसका अहंकार बढ़ता है । इसलिए तर्क वितर्क विवाद आज की अपेक्षा विचार करना उच्च स्थिति है ।
इसमें सत्य अनुसंधान में सहायता मिलती है विचार क्रमबद्ध आते हैं जब इंद्रियों के ग्राह्य पदार्थों के सूक्ष्म में रूपों {विचारों} का निरोध होता है तो उसे सविचार समाधि कहते हैं ।
इसमें विचार का क्रम भी बंद हो जाता है किंतु इसमें इन विचारों के शब्द अर्थ तथा ज्ञान का विकल्प बना रहता है। जब यह विकल्प भी नहीं रहता इसका भी निरोध हो जाता है तो उसे निर्विचार समाधि कहते हैं ।
इस निर्विचार समाधि में विचारों का क्रम सर्वथा रुक जाता है तथा साधक को आनंद की अनुभूति होने लगती है यह आनन्द भीतर के अनुभव के कारण आता है । इसमें अहंकार बना रहने से साधक में द्वैत स्थिति बनी रहती है । साधक जो आत्मज्ञान का इच्छुक है, वह इस आनन्द का भी निरोध करता है । इस निरोध से ‘आनन्दानुगत समाधि’ उपलब्ध होती है ।
इस आनन्दानुगत समाधि के बाद साधक को केवल ‘अस्मिता’ का बोध होता है, ‘मैं हूँ’ का भान रहता है । जब इसका भी निरोध हो जाता है तो इसे ‘अस्मितानुगत समाधि’ कहते हैं ।
इन चारों प्रकार की समाधि को संप
‘सम्प्रज्ञात योग’ अथवा ‘सम्प्रज्ञात समाधि’ कहते हैं ।
इन चारों में प्रत्येक स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली है । यह वशीकार वैराग्य से होती है किंतु इससे भी ‘परम वैराग्य’ नहीं होता । इन चारों में ज्यों-ज्यों ऊपर की स्थिति प्राप्त होती है त्यों-त्यों नीचे की छूटती जाती है क्योंकि सृष्टि निर्माण में प्रकृति का यही क्रम है ।
योग साधना में उसके ठीक विपरीत क्रम से चलना पड़ता है प्रकृति की यात्रा बाह्य ब्रह्म से स्थूल सृष्टि की ओर है- एवं योग में उसके उल्टे क्रम से स्थूल जगत से आत्मा की ओर बढ़ना होता है । आत्मा पर यात्रा समाप्त होती है ।।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













