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पूरे विश्व के संवाद को भाषा देना अनुवाद का मूल ध्येय


– डॉ पूनमचंद टंडन

साझा संसार फाऊंडेशन की पहल पर, ‘अन्तर्राष्ट्रीय अनुवाद काव्य-पाठ’ ऑनलाइन आयोजन, डॉ पूनमचंद टंडन, महासचिव, भारतीय अनुवाद परिषद की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।

इस आयोजन में डॉ मौना कौशिक ने बुल्गारियन भाषा, श्री यूरी बोत्वींकिन ने यूक्रेनी भाषा, चैन्ने से डॉ राजलक्ष्मी कृष्णन ने तमिल भाषा, सुभाषिनी रत्नायक ने सिंहली भाषा (श्रीलंका), डॉ एस ए मंजुनाथ ने कन्नड़ भाषा, डॉ विवेक मणि त्रिपाठी ने चीनी भाषा, डॉ एन गुरुमूर्ति ने तेलुगू भाषा, डॉ सी आर बिंदु ने मलयालम भाषा के अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी अनुवाद काव्य-पाठ में भाग लिया।

इस आयोजन का सशक्त एवं सफल संचालन नीदरलैंड से सुश्री अश्विनी केगांवकर ने किया।

डॉ पूनमचंद टंडन ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सभी रचनाओं की सराहना करते हुए कहा कि आज का आयोजन एक विलक्षण उपलब्धि है। लोहे और पत्थर के इस युग में संवेदनाओं को जीवित रखना लोकहित का कार्य है। कविता अनुवाद बहुत बड़ी चुनौती है। अनुवाद के लिए कवि या कवि मन होना बहुत जरूरी है। कविता शब्दों का जमावड़ा नहीं है। शब्द शरीर हैं। अनुवाद के लिए सममूल्य, समभाव का होना भी आवश्यक है। अनुवाद एक अंतहीन यात्रा है। अनुवाद साधना है। अनुवादक का साधक होना जरूरी है। पूरे विश्व के संवाद को भाषा देना अनुवाद का मूल ध्येय है।

साझा संसार फाऊण्डेशन के अध्यक्ष रामा तक्षक ने स्वागत वक्तव्य में साझा संसार समूह की स्थापना से अब तक भारतीय संस्कृति एवम् साहित्यिक उपलब्धियों की संक्षिप्त जानकारी दी। उन्होंने अनुवाद कार्य की महत्ता को रेखांकित कर बताया कि वैश्विक साहित्य के अनुवाद से भारतीय साहित्य को समृद्ध करना प्रवासी साहित्यकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। अनुवाद परकाया में प्रवेश सरीखा है।

मौना कौशिक ने बुल्गारियाई कवयित्री पेत्या दुबरोवा के जीवन काल के बारे में बताया। इस प्रतिभा का कुल जीवन काल 17 बरस का रहा है। उनकी रचनाएँ आज भी बुल्गारिया में बहुत लोकप्रिय हैं। मौना कौशिक ने इस कवयित्री की एक शून्य सा विस्तार छोड़ती एवम् गहन ‘गान्तका’ यानि ‘पहेली’ पढ़कर सुनाई।

राजलक्ष्मी कृष्णन ने पहले दुर्गा देवी की तमिल मूल भाषा की रचना को पढ़कर सुनाया और हिंदी अनुवाद कर ‘शक्ति की प्रार्थना’ का सारगर्भित संदेश समझाया।

सुभाषिनी रत्नायक ने सिंहली भाषा के महान कवि सेकर की रचना “मिटाकर दूरी अम्बर धरती की, हटाकर पर्दा चाँद और तारों का” पंक्तियों के माध्यम से एक वर्गविहीन, एक शोषण विहीन समाज की संरचना का संदेश दिया।

एस. ए. मंजुनाथ ने कवयित्री डॉ.अंबुजा की ‘दीप’ रचना का कन्नड़ भाषा में रचना पाठ किया। कविता का अनुवाद सुनाते हुए बताया “आओ मिलकर जलाएँ, जातिविहीन दीप, भयविहीन समता का दीप, प्रेम विश्वास और सुख समृद्धि का दीप।”

यूरी बोत्वींकिन ने वसील सिमोनेंको की रचना “तुम जानते हो…” और कवि वसील स्तूस की रचना “भड़को, मेरी आत्मा…” का मार्मिक हिंदी अनुवाद पढ़ा। उन्होंने दोनों कवियों का संक्षिप्त जीवन परिचय भी दिया।

सी आर बिंदु ने अपनी मलयालम कविता शीर्षक ‘दर्पण’ (मलयालम में ‘दर्पणम्’) का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया। दर्पण मन का बदला भाव खींचता, दर्पण टूटने पर भी अपनी पूर्णता लिए होता है। प्रेरणादायक रचना सुनाई।

विवेक मणि त्रिपाठी ने सबसे प्रसिद्ध व महान चीनी कवि ली बाय की दो मार्मिक रचनाएँ सुनाई। ‘मध्यरात्रि की नीरवता में, नम है धरा की कोख’ और ‘मेरी ही तरह चाँद भी बहुत दूर आ गया है मेरे घर से’। प्रकृति और मानव मन का सामिप्य रचनाओं में रेखांकित किया।

गुरुमूर्ति के स्वरचित तेलुगू भाषा में गाये गीत ने सबका मन मोह लिया। उन्होंने गीत का अनुवाद करते हुए बताया कि क्या तुमने कभी बाँसुरी को सुना है ? संगीत की बेल को महसूस किया ? हर शब्द फूल है।

इस आयोजन में भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य की एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह रही कि दक्षिण भारत की भाषाओं को सुनते समय, शब्दों के उच्चारण पर कान के पर्दे तक पहुँच, दूसरी भाषा की समझ के पट खोलता है।

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