
जब से होश संभाला
हमने महसूस किया,
जिंदगी की सड़क पर
मुसीबतों के ढेरों गड्ढे
और अंधे मोड़ हैं।
छुपी हुई चाहतों का शोर है,
समझौतों के जोड़ हैं।
चिकनी सड़क पर
निर्भय होकर बिना ठोकर खाए,
चलने का ढूंढते रहे तोड़ हैं।
वक्त भागता गया।
जिंदगी चलती रही,
आखिरी मोड़ आ गया।
देर से ही सही,
ये समझ में आया
यह जिंदगी का सफर
जिसकी अनुमति से प्रारंभ किया था।
यह मुसीबतों के गड्ढे,
यह चाहतों का शोर,
यह समझौतों के जोड़,
उसी ने सड़क पर बिछाए थे।
हमें परखने के लिए
सुलेखा चटर्जी













