चलो हम अपने गाँव की ओर लौट चले,
छोड़ कर शहर का मोह हम सब।
त्याग गाँव को शहर से क्या लाते है हम।।
शहर में जाते है हम रोजगार पाने के लिए,
लाते है बहुत सा पैसा अपने घर के लिए।
पाते है नये नये शिक्षा व संस्कार भी वहाँँ,
बदलाव चाहते हैं हम अपने घर परिवार के लिए।।
महत्वपूर्ण हो जाता है पैसा कमाना,
पैसा ही पैसा दिखता है सब कुछ अपना।
रिश्ता ना नाता हमे अपना दिखाई देता है,
पैसे को पाने हम भ्रष्टाचार भी करने लगते हैं।।
पैसे के आगे ना हमें कोई अपना दिखता है,
पैसे के साथ ही दिखावे में खो जाते हैं।
त्याग कर अपने घर के संस्कारो को,
हम शहर में रहकर मर्यादा भूल जाते हैं।।
शहर से लाने लगते हैं हम सब,
स्वार्थ व मर्यादाहीन जीवन का सार।
ना सुन पाते हम करूणा की पुकार,
हमारे विचारों में बढने लगता हिंसा का संचार।।
पेसो की चाहत में हम करूणा, शिक्षा व संस्कार,
अक्सर सारे भूल ही जाया करते है ।
रिश्तो व अपनो को समय नही दे पाते है,
अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं रख पाते है ।।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया, डीडवाना,राजस्थान।











