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रामचंद्र भगवान

रामचंद्र भगवान छोटे बाल्यावस्था में 4-5 वर्ष उम्र थी , काकभुशुण्डि के साथ पांव की पैजनिया की मधुर आवाज में खेलते रहते, मां कौशल्या मैया रामचंद्र भगवान को एक सामान्य बालवस्था के रूप में वात्सल्य प्रेम प्यार में निहारती रहती, उसके मातृत्व प्रेम में सरोबार रहती, भगवान श्री राम की अयोध्या में सरयू नदी किनारे राजमहल में घर के दालान में मदमस्त चंचल चप्पल चाल के साथ पायल की छम छम मधूर आवाज़ के इधर-उधर दौडता रहता, मां उसे पकड़ने का प्रयास करती, श्री राम के साथ काकभुशुण्डि भी खेलता रहता,इस दृष्य पर कुछ हिन्दी के उच्च साहित्यकारों ने गीत भजनों को बहुत ही सुन्दर लिखा है,रचा है, और रामायण टीवी सीरियल और फिल्मों में बहुत ही मार्मिक तरिके से बाल्यावस्था का चित्रित किया है, सबसे अधिक लोकप्रिय गीत ठूमक चलत रामचंद्र, बाजे पैजनिया, को क्लासिकल अंदाज में बहुत ही सुन्दर दृश्य में फिल्माया गया है, मां कौशल्या देवी भूल जाती थी कि उनके पुत्र राम भगवान विष्णु भगवान के अवतार पुरूष हैं, एक बार माताश्री डंडा लेकर श्री राम भगवान के शरारत करने पर पीछे पीछे दौड़ती हैं, अचानक मां देखती हैं कि भगवान राम मुख खोलते हैं तो क्या देखती हैं, लाखों करोड़ों खंड ब्रह्मांड की अनन्त रचनाएं जैसे पृथ्वी पाताल आकाश सौरमंडल सुरज चांद सितारें चारों ओर घूमते हुए दृष्टिगोचर हो रहें हैं, काकशूभंडी काग भी उनके मुखमंडल में उड़ान भरते हुए अनन्त अनन्त लोकों की सेर करते हुए अंत तक थाह नहीं ले पा रहे थे, मुख भीतर ईश्वर की बेअंत माया को देखकर कौशल्या मैया हेरान हो गई, देखा अन्दर अनन्त लोक परलोक का कोई वारा नारा नहीं, कोई अंत नहीं, प्रभु की बेअंत माया को देखकर कौशल्या मैया खश खाकर गिर गई, उसे काफ़ी समय तक हौश न रहा, अपनी सुध-बुध खो गई, ऐसे ही प्रसंग कृष्ण यशोदा मैया माखन चोर नन्दलाल बालकृष्ण लीला के रूप में देखने को मिलती हैं , इस बाल लीला प्रसंग से हमें यह आध्यात्मिक ज्ञान मिलता हैं कि पूरे ब्रह्मांड खंड ब्रह्मांड हमारे मानव शरीर के भीतर मिलता हैं, परमात्मा व परमात्मा की विराट रचना हमारे अन्दर हैं, अब सवाल यह पैदा होता हैं कि हमारे अन्दर इतने छोटे शरीर में पुरा खंड ब्रह्मंड कैसे आ गया, कैसे समा गया, जवाब हैं, जब हम गुरु के मार्गदर्शन अनुसार अंतर्मुखी साधना करते हैं, तब अपने भीतर आत्म केंद्रित ध्यान द्वारा शरीर की चेतना की उच्चतम सर्वोच्च अवस्था में पहुंचते हैं, तो ऐसी अवस्था में चेतन्य आत्मा को चेतना ही दृश्यमान दिखता है, जैसे समुद्र में मीट्टी के घड़े के अन्दर जलता हुआ रखा दीपक तैर रहा हो,मिट्टी का घड़ा जल में घुलकर अदृश्य हो जाता हैं, और तब दीपक की लौ जलती रहती हैं, आत्मा की चेतना , चेतना में एक मेक हो एकात्म हो जाती हैं, बुंद सागर में मिलकर सागर हो जाती हैं, ऐसे ही प्रभु श्री राम और प्रभु श्री कृष्ण का वृत्तांत चेतना के उच्च स्तर का वर्णन प्रसंग हैं।

जय श्री राम।

जय श्री कृष्णा।

प्रकाश कल्याणी मंदसौर म प्र

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