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वाणी की कटुता

ज्ञान ध्यान का गूढ़ रहस्य
नहीं किसी को समझना है।
नहीं करनी परवाह किसी की
बस मनमानी करना है।

वाणी तो है तरकश के तीर सा
बस उसको निकलना है।
नहीं समझना भाव दूसरे का
बस छलनी ही करना है।

ज्वालामुखी का लावा सा,
कोई हर पल रिस्ता रहता है।
करता है खोखला खुद को,
निस दिन आग उगलता है।

राग-द्वेष से भरा मानव मन,
अशांत सदा ही रहता है।
ना खुद जीता चैन से,
ना किसी को जीने देता है

  • उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
    देहरादून (उत्तराखंड)

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