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साधन पाद सूत्र– १ का शेष भाग–

दूसरा साधन है ‘तप’ ।
*तप का अर्थ शरीर को कष्ट मात्र देना नहीं है, जो शरीर को पापी समझकर उसे निरन्तर सताते रहते हैं वे हिंसक चित्त वाले हैं {गहराई से} वे हिंसा भावना से पीड़ित हैं । *शरीर को भूखा प्यासा रखना, कांटों पर सोना, शरीर को कोड़े लगाना, पंचाग्निमें तप करना, सर्दी, गर्मी सहन करना, नग्न रहना आदि शरीर को सताने वाली अनेक क्रियाएं अज्ञानी जन करते रहते हैं किंतु उन्हें तप नहीं कह सकते ।*
इनका ना तो आत्मज्ञान से कोई सम्बन्ध है ना मोक्ष प्राप्ति से ।
ये केवल अहंकार को तुष्ट करते हैं ।

तप का अर्थ है साधना काल में जो-जो शारीरिक तथा मानसिक कष्ट प्राप्त हों उन्हें सहर्ष ईश्वर इच्छा समझकर स्वीकार कर लेना तथा प्रतिक्रिया न करना ।
साधना काल में व्रत, उपवास, स्वधर्म पालन, स्वकर्तव्य पालन, नियम, संयम आज जितने भी शास्त्रोक्त कर्तव्य कर्म है उन्हें निष्ठा एवं ईमानदारी से फल की इच्छा का त्याग करते हुए करना तथा इसमें जो भी कष्ट हो उसे सहन करना ही तप है । ऐसे तप से अंतःकरण शुद्ध होता है ।
तीसरा साधन ‘स्वाध्याय’ है । स्वाध्याय में उन ग्रन्थों का अध्ययन भी सम्मिलित है जिससे साधक की योग में रुचि बढ़ती है, अपने कर्तव्य का बोध होता है तथा चित्त में वैसी ही भावना का उदय होता है यह स्वाध्याय साधक के लिए मार्गदर्शक होता है । इससे भी चित्त निर्मल होता है किंतु इससे भी ऊपर इसका अर्थ है ‘स्व’ का अध्ययन । ध्यान की स्थिति में अपने स्वरूप का ध्यान करना, आत्मा, ओंकार, ईश्वर का ध्यान करना तथा उसी के मंत्र का जाप करना, आत्मा एवं परमात्मा में अवैध संबंध बनाने की क्रिया ही ‘स्वाध्याय’ है इनसे स्वयं के दोष दूर होकर चित्त-वृत्तियों का निरोध होता है । इन तीनों को क्रिया योग कहते हैं ।
साधक इस क्रिया योग से साधना आरम्भ कर सकता है । यह क्रिया योग इंद्रियों को वश में करने वाला, मन को भटकने से रोकने वाला तथा अहंकार को क्षीण करने वाला है इसलिए यह योग सिद्धि में सहायक है । चंचल मन वालों के लिए यह प्रारम्भ है जिससे चलकर वह समाधि लाभ कर सकता है । पूर्व प्रकरण में जो योग के साधन बताए गए हैं वे मन ही पर निर्भर हैं । किन्तु जो इन विधियों से मन को नियंत्रित नहीं कर सकते उनके लिए यह क्रिया योग बतलाया गया है ।
इस क्रिया योग से भी, सभी क्लेश कमजोर हो जाते हैं और समाधि की योग्यता हो जाती है । समाधि अवस्था में ही सभी दु:खों का नाश हो जाता है तथा सुख की प्राप्ति होती है ।
ये तीनों ही साधन {तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान} क्रिया योग कहलाते हैं । ‘साधन पाद’ में इसी का वर्णन है ।

स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
‘साधक’ बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार

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