
स्वर्णिम अतीत का गान करो, दिल में आत्मीय जज़्बात भरो
बने राष्ट्र सिरमौर मेरा फिर,मातृभूमि से प्यार करो।
नमन करो इस मिट्टी को,जो जीवन रक्षक हमारी है।
वायु, जल ,तरू, वन-उपवन,इनसे चलती साँस हमारी है।
धान्य आगार शस्य श्यामला भूमि,
पालक- पोषक हमारी है।
लहराती धानी चूनर संग, प्रचुर खनिज-संपदा हमारी है।
कल-कल करते सरित- सरि – निर्झर, नेमतें अभिराम हमारी हैं।
प्रकृति – प्रदत्त रत्न अनमोल ,सुन्दर सृष्टि हमारी है।
अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य- बोध भी,अपरिहार्य देश- हित रखना है।,
वन संरक्षण , जल संग्रहण कर, विरासत भी अपनी सहेजना है।
हम न्यौछावर हों वतन पर अपने,
निज गौरव का अभिमान रहे।
अपनायें स्वदेशी को पूर्णतया, अपनी मिट्टी से जुडें रहें।
कहलाता था जो सोने की चिड़िया, हम उस वैभव को खो बैठे।
विदेशी वस्तुओं की आभा में खोकर, निज उत्पाद हीन समझ बैठे।
भारत माता से प्रेम करो , स्वदेशी को अंगीकार करो।
भारत भूमि सर्वोपरि रहे, संकल्प आज सब अटल करो।।
मंजू शकुन खरे











