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अमर भारत – ओज गाथा

क्यों सागर की गहराई को अम्बर ने कभी नापा है?
क्यों धरती की अंगड़ाई को पर्वत ने कभी थामा है?

बहती नदियों की धारा को किसने आज तलक रोका?
जो रोके प्रकृति के वेग को, उसने खुद को ही धोखा।

कुछ मूर्ख मद में डूबे जन इतिहास बदलना चाहते हैं,
“हिंदू कोई जात नहीं”— यह कह भ्रम फैलाते हैं।

तो एक स्थल ऐसा बतला दो, जो हिंदुस्तान से न्यारा हो,
जहाँ शौर्य, करुणा, त्याग मिला हो— वैसा धाम दुबारा हो।

कितने दुश्मन आए यहाँ, पर मुँह की खाकर लौट गए,
जो रणभूमि में अड़े रहे, वे मिट्टी में ही सो गए।

जो रुक गया, वह मिट गया— इतिहास यही दोहराता है,
जो आँख उठाए इस धरा पर, अंत समय पछताता है।

भारत के भाग्यविधाता भय से कब झुका करते हैं?
बस जयचंदों के जंजालों से सावधान रहा करते हैं।

अभी राणा की रगों का रक्त धरा में ज्वाला बनता है,
वीर कुंवर की हुंकारों से रण का स्वर फिर उठता है।

भगवा रंग है वीरों का, बाकी रंग सब फीके हैं,
त्याग, तपस्या, बलिदानों के अमर प्रतीक अरीखे हैं।

धरती पर बस एक वतन है— जिसका नाम हिंदुस्तान है,
जहाँ शौर्य-गाथाएँ गूँजतीं, हर कण में सम्मान है।

यह मिट्टी चंदन-सी पावन, गंगा-जल-सा अभिमान है,
हर बच्चे के हृदय में बसता— भारत ही भगवान है।

आँधी आए, तूफ़ान उठे, पर दीप यहाँ न बुझता है,
सीना तान खड़ा हर प्रहरी जब संकट सिर पर चढ़ता है।

जो इस धरा को आँख दिखाए, इतिहास वही दोहराता है—
राणा की संतानों से टकराकर हर शत्रु मिट जाता है।
आर एस लॉस्टम

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