
यह कहानी उस युग की है, जब राजाओं के बीच सत्ता के लिए निरंतर युद्ध होते रहते थे। तलवारें म्यान से बाहर
रहतीं,और रक्तपिपासु सेनाएँ एक-दूसरे के विनाश के लिए आतुर रहती थीं। यह कथा लगभग पंद्रह सौ वर्ष पूर्व की है।
भारत की पश्चिम दिशा में एक समृद्ध रियासत थी—तिकडमगढ़, जिसके शासक थे महाराज रुपरांजये। वे एक कुशल, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा थे। उनकी शासन-व्यवस्था में प्रजा सुखी थी, चारों ओर खुशहाली और शांति व्याप्त थी।
तिकडमगढ़ की महारानी थीं रीमवती, जो कुशलगढ़ के महाराज रामचंद्रोदये की सुपुत्री थीं। कुशलगढ़ भी एक विशाल और वैभवशाली राज्य था, जिसकी सीमाएँ श्रीलंका से कंधार तक फैली हुई थीं। किंतु एक युद्ध में महाराज रामचंद्रोदये को पराजय का सामना करना पड़ा था। अपने राज्य और प्रजा की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी पुत्री रीमवती का विवाह महाराज रुपरांजये से प्रस्तावित किया, जिसे रुपरांजये ने सम्मानपूर्वक स्वीकार किया।
इस विवाह को चौदह वर्ष बीत चुके थे। अब दोनों राज्यों में पूर्ण सौहार्द और सहयोग था। समय के साथ महाराज रामचंद्रोदये वृद्ध हो चले थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, सिवाय रानी रीमवती के। इसी कारण वे एक दिन स्वयं महाराज रुपरांजये के समक्ष उपस्थित हुए।
विनम्र स्वर में महाराज रामचंद्रोदये बोले—
“पुत्र, एक विशेष प्रार्थना लेकर आया हूँ। आशा है, मुझे निराश नहीं करोगे।”
रुपरांजये ने हाथ जोड़कर कहा—
“आप आज्ञा दें, महाराज।”
रामचंद्रोदये बोले—
“मैं चाहता हूँ कि कुशलगढ़ को भी तुम अपने राज्य में विलय कर लो। अब दोनों राज्यों का भार तुम्हीं सँभालो।”
रुपरांजये ने आश्चर्य से पूछा—
“महाराज, इस अचानक निर्णय का कारण?”
रामचंद्रोदये शांत भाव से बोले—
“कोई विशेष कारण नहीं, पुत्र। अब शेष जीवन भगवान शिव के चरणों में बिताना चाहता हूँ।”
रुपरांजये ने श्रद्धा से सिर झुकाया—
“आपका आदेश मेरे लिए सर्वोपरि है।”
इस प्रकार दोनों राज्य एक होकर एक विशाल साम्राज्य बन गए। महाराज रामचंद्रोदये ने राज्य त्याग कर शिव-भक्ति का मार्ग चुन लिया। महाराज रुपरांजये ने तिकडमगढ़ और कुशलगढ़—दोनों को समान न्याय और कुशलता से सँभाल लिया। प्रजा उन्हें पिता समान मानने लगी।
पर कहते हैं, सुख अधिक दिनों तक टिकता नहीं। किसी न किसी की कुदृष्टि अवश्य पड़ती है। तिकडमगढ़ में यह कुदृष्टि आई—धुरतचंद, महाराज रुपरांजये के सौतेले भाई, के रूप में।
धुरतचंद सदा षड्यंत्रों में लिप्त रहता था। उसका एकमात्र उद्देश्य था—महाराज रुपरांजये का पतन और स्वयं सत्ता पर अधिकार। योग्यता न होने के कारण भी वह स्वयं को राजा बनने योग्य समझता था। किंतु महाराज रामप्यारेजये ने राज्य रुपरांजये को सौंपा था, जिन्होंने अपने कर्तव्य से पिता की आशाओं को सत्य सिद्ध किया।
धुरतचंद की कुटिलता से तंग आकर महाराज ने उसे राज्य से निष्कासित कर दिया। किंतु एक भूल हो गई—सेनापति चतुरंगनी को महाराज पहचान न सके। वही चतुरंगनी भीतर ही भीतर राज्य को खोखला करता रहा और हर सूचना धुरतचंद तक पहुँचाता रहा।
एक समय उसने खुला राजद्रोह करने का प्रयास किया, किंतु ऐन समय पर सेना ने उसका साथ छोड़ दिया। चतुरंगनी को घुटने टेकने पड़े। महाराज ने उसकी जान बख्श दी, किंतु उसे देशनिकाला दे दिया गया और खंखड़ा विजुवन में छोड़ आने का आदेश दिया।
तिकडमगढ़ शत्रुओं से मुक्त तो हो गया, पर वह शांति असामान्य थी—ठीक वैसी ही, जैसी प्रलय से पहले समुद्र की निस्तब्धता होती है।
इधर महाराज रुपरांजये अपने कर्तव्यों में व्यस्त थे। वे प्रजा के दुःख को अपना दुःख मानते थे। उनके दो पुत्र थे—बड़े पुत्र त्रयाश्रये, आयु दस वर्ष, और छोटे पुत्र तंमंजये, आयु सात वर्ष।
तंमंजये बचपन से ही साहसी, निडर और वीर था। तलवारबाज़ी और घुड़सवारी में वह अद्भुत था, किंतु शिक्षा में उसकी रुचि नहीं थी। गुरुकुल से वह दूरी बनाए रखता था। इसी कारण महाराज उसके भविष्य को लेकर अक्सर चिंतित रहते थे।
आगे की कथा
एक दिन महाराज अपने विश्राम कक्ष में गहन विचारों में डूबे थे। तभी महारानी रीमवती ने प्रवेश किया।
“महाराज, आप किस सोच में लीन हैं? क्या कोई चिंता सताए जा रही है?”
महाराज ने उत्तर नहीं दिया।
“महाराज… महाराज…”
जैसे गहरी नींद से जागते हुए रुपरांजये चौंके।
रीमवती पास बैठते हुए बोलीं—
“क्या बात है महाराज? मन व्याकुल क्यों है?”
रुपरांजये उदास स्वर में बोले—
“आज तंमंजये की बहुत याद आ रही है, महारानी। पता नहीं वह कहाँ होगा… किन परिस्थितियों से गुजर रहा होगा।”
रीमवती ने धैर्य से कहा—
“महाराज, तंमंजये बचपन से ही साहसी और दृढ़ है। जहाँ भी होगा, सुरक्षित होगा।”
रुपरांजये की आँखें नम हो गईं—
“फिर भी, मन विचलित है। उसकी याद हृदय को पीड़ा दे रही है।”
“महाकाल मेरे पुत्र की रक्षा करें…”
यह कहते-कहते महाराज भावुक हो उठे।
“काश, उस दिन मैं उसे रोक लेता। इतनी छोटी उम्र में उसने सब सुख-सुविधाएँ त्याग दीं। क्या कोई पिता इतना कठोर हो सकता है…?”
“पुत्र… तंमंजये… तुम कहाँ हो…”
महारानी की आँखें भी भर आईं, पर उन्होंने स्वयं को सँभालते हुए कहा—
“महाराज, धैर्य रखें। हमारा पुत्र जहाँ भी होगा—स्वस्थ, सुरक्षित और अपने भाग्य-पथ पर
आर एस लॉस्टम










