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होलिका दहन

फाल्गुन मास पूर्णिमा शुभ दिन , धर्म – पथ की जीत हुई थी।
दुष्ट हिरणकश्यप की अनुजा, अग्नि में जल खाक हुई थी।
पाया था छल से वरदान, पावक अंग न छू पायेगी,
भारी हूँ मैं सम्मुख ज्वाला के,अनल न सम्मुख टिक पायेगी।
अबोध बालक को लिये होलिका , मद में चूर बहुत इतराई,
कर दूंगी खात्मा इक पल में, दनुज भ्राता को आस बंधाई।
हरि नाम ह्दय में रखकर , बुआ-अंक बालक जा बैठा।
दग्ध हुताशन मध्य शीत उर, परम ब्रह्म हृदयतल था पैठा।
अट्टहास लगाता था हिरण्यकश्यप, दैत्य-दल धूम मचाता था।
नन्हे प्रहलाद की चीखें सुनने, उत्सुक -तत्पर दिखता था।
यथाशक्ति बालक को भींचे, होलिका मंद मुस्काती थी।
अधर्मी कृत्य पर दानवी को, किंचित लाज न आती थी।
थी मद में चूर विजय की अपने ,पर जीती बाजी पलट गई।
जलने लगी होलिका धू-धू, प्रभु ने थी कैसी माया रची?
आर्तनाद करती होलिका, ब्रह्म देव पर आरोप लगाई,
छल किया विधाता तुमने मुझसे, वचनों की न आन निभाई।
घन- गंभीर वाणी तब सहसा, नभमंडल निस्सीम गुंजाई,
” पाया था वर कुछ सीमा – शर्तों पर , कटिबद्ध प्राण हरण हो आईं,
हे मूर्खा!अधम मार्ग पर चल, वर की मर्यादा तुमने मिटाई।”
क्षण भर में खाक हुई दानवी, बालक सकुशल बाहर आया।
प्रभु नाम सुधा- रस चखा जिसने, कब काल भीत उसे कर पाया।
अशुभ पर शुभ की, अधर्म पर धर्म की, बुराई पर अच्छाई की जय का‌ पावन पर्व है।
मन का कलुष, वैमनस्य मिटाता, शुचिता सुहावन स्वरूप है।
चित्त की हरेक दुर्भावना, तर्पण अग्नि में हम करें।
नेह, प्रेम ,उल्लास ,उमंग, जीवन में सकारात्मकता भरें।।
——–मंजू शकुन खरे —

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