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जगदीश साहित्य संस्थान विषय:होली के रंग

विधा: जोगीरा छंद

जोगीरा सा रा रा रा रा

होली खेले राधा-मोहन, खेल रहे सब झूम।
बरसाने की गोपी ब्रज में, मचा रही है धूम।।
जोगीरा सा रा रा रा रा जोगीरा सा रा रा रा रा रा

रंगों का त्यौहार है आया, रंगीले हैं कान।
भोली राधा संग साँवरे, भूली अपना भान।।
जोगीरा सा रा रा रा रा रा जोगीरा सा रा रा रा रा रा

बात-बात में छलिया छलता, लगा केसरी रंग।
वर्ण गौर है सखी राधिका, कान्हा देख दबंग।।
जोगीरा सा रा रा रा रा रा जोगीरा सा रा रा रा रा रा

जोरी-जोरी करते टूटी, काँच चूड़ियाँ हाथ।
मोहन से तब राधा रूठी, छोड़ दिया अब साथ।।
जोगीरा सा रा रा रा रा जोगीरा सा रा रा रा रा

कान पकड़ फिर मना रहे हैं, जग के दीनानाथ।
तुम जीती मैं हार राधिका, गया शपथ लूँ माथ।।
जोगीरा सा रा रा रा रा जोगीरा सा रा रा रा रा

एक चोर फिर सीना जोरी, मचा रहा हुड़दंग।
लाल लाडला मात यशोदा, देख करे है तंग।।
जोगीरा सा रा रा रा रा जोगीरा सा रा रा रा रा

वृषभानु की बड़ी लाडली, आंखों करती जंग।
कान्हा तेरे प्यारे-प्यारे, शब्दों में है भंग।।
जोगीरा सा रा रा रा रा जोगीरा सा हा हा हा हा

नित्य नई तू लीला करता, गोकुल में आनंद।
बंसी धर बस मुरली से भर, हिय में सुख का कंद।।
जोगीरा सा रा रा रा रा जोगीरा सा हा हा हा हा


दीपिका किशोरी ‘चांँदनी’
गुजरात

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