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दंभ का जलवा

बाहुबली चले
बना कर अपनी राह
राह में कांटे बड़े
सूझ रही न ठोर
अंधकार फैले आए रात अमा
चांदनी का सपना
सपना बन ढह जाए
ताले नहीं जुबां
जब ग्रहों की चाल बदले
ताले पड़े निगाह
करनी पर पछताए
जाए अब कहां।

वो कर्म किया
जो नहीं किसी के हेत
अब क्या बने
जब चिड़िया चुग गई खेत
पाले थे जो सपने
सपनों के महल बिखर ढह जाएंगे अब
ज्यों बालू ज्यों रेत।

हिटलर नहीं कभी मरा
पुनर्जीवित हो
दिखाए वो फिर जलवा
इस धरा
हरा हरा सब चुग लिया
तृप्ति ऐसे नर की कभी न हो
चाहे हो पेट भरा।

सत्य छिपाए न छिपे
और झूठ के होते नहीं पांव
झूठ चले न चार दिन
उलटे पड़ जाएं सब दांव ।
इस जग वही बने
जो रच दिया अनादि ने
पुनर्जन्म हो गया ‘ गिद्ध का ‘
चहुं दिस होगी कौए की कांव-कांव ।

महेश शर्मा,करनाल

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