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होली का आधुनिक रंग

रंगों संग विज्ञापनों की बहार,
ऑर्गेनिक लिखकर गुलाल के पैकेट,
दुगने दामों पर बिकने को तैयार।
अबीर संग उड़ते हैं ऑफर,
त्यौहार बंधा बाजार की डोर।
गुझिया भी पैक्ड डिब्बे में,
फेस्टिव स्पेशल नाम से बिक रही।
पकवानों की महक घर से ज्यादा ,
स्टेटस में महक रही।
रंग बिरंगे ट्रेंड आ गए,
हैश टैग की बरसात हुई।
साल भर जो कभी हाल न पूछें,
वो भी लिख रहे ‘ मिस्ड यू जी। ‘
हर गली मुहल्ले बजता डीजे,
ढोलक की थाप पर सोता विवेक।
शराब के घूंट में डूबता संयम,
बस सेल्फी में मुस्कुराता त्यौहार।
जिनकी शक्ल देखना भी नहीं पसंद,
उन्हें भी हैप्पी होली कह रहे।
क्योंकि कैमरा ऑन है तो,
दुश्मनों से भी गले मिल रहे।
होली था मन के मैल धोने का पर्व,
जाने कब इसका अर्थ बदल गया।
‘ बुरा न मानो होली है ‘ की आड़ में,
संवेदनाओं का क्षरण होने लगा।
जब रंग उतारा होली का तो,
अपनापन भी संग धुल सा गया।
बाहर शोर बहुत था मगर,
मन एकाकी सा रह गया।

डॉ.दीप्ति खरे
मंडला(मध्य प्रदेश)

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