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अधूरा आलिंगन


आज उससे मिलकर ये यक़ीं-सा लगता है,
उसके दिल में भी मेरा नाम बसता लगता है।

उसकी आँखों में कोई राज़ चमकता-सा था,
मेरे ही ख़्वाब का आईना लगता है।

जी ये करता था कि बाँहों में समेटूँ उसको,
फ़ासलों का ये जहाँ कितना छलता लगता है।

यूँ लिपट जाऊँ कि मिट जाएँ सभी सरहदें,
दो धड़कनों का मिलन ही असल लगता है।

मैं भी चुप था, वो भी कुछ बोल न पाई लेकिन,
ख़ामुशी का हर लफ़्ज़ बोलता लगता है।

रूपेश, ये कैसा असर है तेरी चाहत का,
अधूरा आलिंगन भी आज मुकम्मल लगता है।

आर एस लॉस्टम

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