
अध्याय – 2
राजपाट त्यागने के पश्चात तंमंजये अनजान दिशाओं में चलता चला गया। समय, थकान और भूख—तीनों का उसे भान न रहा। चलते-चलते वह एक महाघनघोर जंगल में भटक गया। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, सघन झाड़ियाँ और रहस्यमयी निस्तब्धता थी। यह स्थान भयावह भी था और अद्भुत भी।
उसी वन में अचानक उसका साक्षात्कार एक तेजस्वी ऋषि-मुनि से हुआ।
ऋषि ने गंभीर स्वर में पूछा—
“तुम कौन हो, बालक? और इस भयानक जंगल में क्या कर रहे हो?”
तंमंजये ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया—
“प्रणाम मुनिवर। मेरा नाम तंमंजये है। मैं इसी राज्य के महाराज रुपरांजये का छोटा पुत्र हूँ।”
ऋषि ने विस्मय से बालक को देखा—
“तुम यहाँ क्यों हो? क्या कोई विशेष उद्देश्य लेकर आए हो?”
तंमंजये ने धीमे स्वर में कहा—
“नहीं मुनिवर। मेरा मन कुछ दिनों से व्याकुल था। उसी व्याकुलता में मैं सब सुख-सुविधाएँ त्यागकर भटकता रहा और मार्ग भूल गया।”
ऋषि ने चिंतित होकर पूछा—
“इतनी कम आयु में मन की ऐसी बेचैनी क्यों? क्या राज्य पर कोई संकट है? या महाराज असुरक्षित हैं?”
“नहीं मुनिवर,” तंमंजये बोला,
“राज्य और महाराज—दोनों सकुशल हैं।”
ऋषि कुछ क्षण मौन रहे, फिर स्नेहपूर्वक बोले—
“बालक, अभी इस वन में रुकना तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है। आओ, मेरी कुटिया पास ही है। आज रात्रि वहीं विश्राम करो। लगता है तुमने कई दिनों से अन्न-जल भी नहीं लिया है।”
“जैसी आपकी आज्ञा, मुनिवर,” कहकर तंमंजये उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।
ऋषि ने प्रेमपूर्वक उसे भोजन कराया और विश्राम करने का संकेत दिया।
“जाओ बालक, बहुत थक गए हो। विश्राम करो।”
यह तंमंजये के जीवन का पहला अवसर था जब वह माता-पिता, राजपाट और सुरक्षा से दूर—एक अज्ञात, भयावह वन में था। चारों ओर केवल जंगली प्राणी और एकमात्र मानव—वह ऋषि।
लेटे-लेटे तंमंजये सोचने लगा—
यदि आज मुनिवर न मिलते, तो मेरा क्या होता?
मन ही मन उसने महादेव को धन्यवाद दिया और ऋषि के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। कुछ ही देर में वह गहरी नींद में सो गया।
अगली सुबह तंमंजये ने देखा कि ऋषि किसी विशेष तैयारी में लगे हैं।
“प्रणाम मुनिवर,” तंमंजये बोला।
“आयुष्मान भव, बालक,” ऋषि ने उत्तर दिया।
“क्या आज कोई विशेष उत्सव है?”
“हाँ बालक, आज एक छोटी-सी पूजा है।”
“तो मैं प्रस्थान की आज्ञा चाहूँगा,” तंमंजये बोला।
ऋषि मुस्कराए—
“यदि चाहो तो आज सम्मिलित हो जाओ। कल प्रातः चले जाना। वैसे भी तुम अपने लक्ष्य के बहुत निकट हो।”
“कैसा लक्ष्य, मुनिवर?”
“वह समय आने पर स्वयं प्रकट होगा,” ऋषि ने कहा।
तंमंजये ने रुकने का निर्णय लिया और पूरे मन से ऋषि के कार्यों में सहयोग करने लगा।
वह यह देखकर अत्यंत आश्चर्यचकित था कि इस पूजा में हाथी, घोड़ा, गधा, हिरण, गीदड़, भालू, बंदर, चीता, शेर, भैंसा—असंख्य जीव सम्मिलित थे। सभी ऋषि से प्रेम करते थे और ऋषि सभी से।
दिन आनंद और शांति में बीत गया। संध्या होते-होते सभी जीव अपने-अपने स्थानों को लौट गए और ऋषि भी विश्राम हेतु चले गए।
तंमंजये इन बातों से अनभिज्ञ था कि आदमखोर शेर कई बार इस ऋषि को मारने का प्रयास कर चुका था।
रात्रि में तंमंजये सोच रहा था—
क्या मेरा यहाँ आना केवल संयोग है? या इसके पीछे कोई गूढ़ कारण है?
तभी ऋषि की आवाज़ आई—
“बालक, विश्राम करो। शीघ्र ही तुम्हारा कार्य प्रारंभ होने वाला है।”
इन शब्दों ने तंमंजये को और उलझन में डाल दिया।
अभी वह कुटिया में प्रवेश ही कर रहा था कि अचानक एक भयावह गर्जना सुनाई दी।
तंमंजये दौड़कर ऋषि की कुटिया की ओर गया और जो दृश्य उसने देखा—उससे उसके होश उड़ गए।
एक शेर ऋषि पर आक्रमण कर चुका था।
ऋषि की दाईं भुजा उखाड़ ली गई थी।
ऋषि ने अंतिम शक्ति से तंमंजये को संकेत किया—
“बालक, मेरे पास आओ।”
तंमंजये रोते हुए पास पहुँचा।
“बालक,” ऋषि बोले,
“आज से मेरे शेष बचे कार्य तुम पूरे करोगे—मुझे यह वचन दो।”
“मुनिवर, मैं तो एक छोटा बालक हूँ…”
“नहीं,” ऋषि बोले,
“विधाता ने तुम्हें इसी हेतु यहाँ भेजा है। एक संदेश महाराज तक अवश्य पहुँचाना—राज्य और महाराज दोनों संकट में हैं। शत्रु किसी भी समय आक्रमण कर सकते हैं।”
इतना कहकर ऋषि ने प्राण त्याग दिए।
तंमंजये विलाप करने लगा—
“हे महाकाल! मुझे शक्ति दो कि मैं मुनिवर की आज्ञा का पालन कर सकूँ।”
ऋषि का विधि-विधान से अंतिम संस्कार करने के बाद तंमंजये ने उसी कुटिया में रहने का निश्चय किया। उसने ठान लिया कि वह ऋषि के अधूरे कार्य पूरे करेगा और तिकडमगढ़ की रक्षा हेतु एक शक्ति संगठित करेगा।
पर एक प्रश्न उसे लगातार कचोट रहा था—
महाराज तक संदेश कैसे पहुँचे?
उसी समय एक विचित्र, चंचल जीव वहाँ से गुजर रहा था—मुसकराज।
“मुसकराज, तनिक रुकिए,” तंमंजये ने कहा।
“क्यों रुकूँ? तुम कौन हो?”
तंमंजये ने सब कुछ बताया।
“यदि यह मुनिवर का संदेश है,” मुसकराज गंभीर हो गया,
“तो यह अत्यंत चिंताजनक है। वे ब्रह्मज्ञानी थे।”
“तो क्या आप महाराज तक संदेश पहुँचा सकते हैं?”
“हाँ, यह मेरा कर्तव्य है,” मुसकराज बोला।
जाते-जाते वह बोला—
“राजकुमार, यहाँ सावधान रहना। विशेषकर आदमखोर शेर और उस मूर्ख महाबली भैंसे से।”
यह कहकर मुसकराज महाराज के पास संदेश लेकर चला गया।
अब आगे…
नियति की अगली चाल क्या होगी?
क्या तिकडमगढ़ पर सचमुच आक्रमण होगा?
और तंमंजये—एक बालक—इस महासंकट में क्या भूमिका निभाएगा?
आर एस लॉस्टम











