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“नारी: निस्वार्थ सेवा की प्रतिमूर्ति”

त्याग की पावन मूरत है वो, ममता की अविरल धारा है,
सृष्टि के हर एक स्पंदन में, उसका ही सहारा है।
न कोई शर्त, न कोई तृष्णा, मन में केवल करुणा है,
नारी के निस्वार्थ भाव से ही, सजती यह वसुंधरा है।।

​प्यार का भाव जब अंतर्मन में, संपूर्ण समर्पण बनता है, तब सेवा का हर एक कर्म, पावन चंदन सा महकता है।
थकती नहीं जो अपनों की, खुशियाँ बुनते-बुनते कभी,
वो मौन तपस्या करती है, जग से अनजानी बनके अभी।।

​धैर्य की वो पराकाष्ठा है, सहनशीलता का मान है,
अंधेरों में जो जलती रहे, वो दीप्तिमान मशाल है।
उसके हाथों के स्पर्श मात्र से, हर पीड़ा मिट जाती है,
स्वयं को खोकर औरों को, जीना वही सिखाती है।।

​रिश्तों की हर उलझी डोर को, प्रेम से जो सुलझाती है,
अपने लहू के कतरे से, वो घर-आँगन महकाती है।
इस निस्वार्थ समर्पण का, कोई मोल नहीं इस दुनिया में,
नारी ही वह शक्ति स्वरूपा, पूज्य है नारी दुनिया में।।

भाव समर्पण का ही बस अब, आँखों से झलकता है,
अश्रु जल भी पलकों से अब, हरदम ही छलकता है।
जाने कितने रूप हैं उसके, मन में त्याग वो भरती है,
सच्चाई तो यही है दुनिया, नारी बड़ी प्यारी होती है।।

मन के सब जज़्बातों को वो, हँसकर सदा दबाती है,
अपने गहरे ज़ख्मों को भी, जग से सदा छिपाती है।
मर्यादा की खातिर वो तो, पीड़ा में भी मुसकाती है,
सच्चाई तो यही है दुनिया, नारी बड़ी प्यारी होती है।।

सिर्फ जिस्म नहीं जान है उसमें, रूह में कभी झाँको उसके,
रुकती क्यूँ निगाहें बदन पे? घर की शान देखो उसके।
अंधेरे में दीप जलाकर, जीवन रौशन करती है,
सच्चाई तो यही है दुनिया, नारी बड़ी प्यारी होती है।।

घर-आँगन को महकाती वो, दीये की लौ बन जलती है,
आए जो तूफ़ान ज़हर का, हँसकर खाक वो करती है।
उलझी बातों को सुलझाकर, दिल के तार मिलाती है,
सच्चाई तो यही है दुनिया, नारी बड़ी प्यारी होती है।।

भूख लगी तो पानी पीकर, अपनी प्यास बुझाती है,
नींद आए तो थक कर भी वो, लोरी हमें सुनाती है।
अपनों की खातिर जीती है, खुद को जीना सिखाती है,
सच्चाई तो यही है दुनिया, नारी बड़ी प्यारी होती है।।

नये ख़्वाब आँखों में लेकर, मंज़िल की ओर बढ़ती है,
हर मुश्किल को मात देकर , ऊँचा नाम वो करती है।
लिखती है ‘रजनी’ कलम से, महिमा उसकी न्यारी है,
जग कहे ये बात हमेशा, नारी बड़ी प्यारी होती है।।

रजनी कुमारी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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