
नारी
नारी नारी सब भजत नारी का ना हुआ कोय
जो नारी को भजत जोरू का गुलाम कहलात होय
दुभाषिय चक्रव्यूह मे फंसी नारी सर्वत्र ही त्रास रही
सहनशीलता की मिसाल नारी ही जग की आस रही
जगतजननी नारी नाना रुपों मे व्याप्त जग की खैवनहार है
आधी आबादी की स्वामिनी तुमसे ही चलायेमान ये संसार है
अदभुत शक्ति की स्वामिन नारी ही विकास है विनाश है
जिस रज तजे तैं रूप मे ही नारी तेरा वास है
अर्धान्गिनी से लेकर माँ मे समाया ये संसार है
आदिशाक्ति स्वरूपा मे दुर्जनो का संहार है
ममता और प्रेम रूप मे बसी हे नारी पुरुष का अभिमान हो
नारी बिन जग की उत्पत्ती ही कोरी कल्पना समान हो
अर्धनारीश्वर शिव ही नारी महिमा के प्रकटहार है
समर्पण सादगी प्रेम की मूरत नारी ही सम्पूर्ण संसार है
भगिनी भार्या माँ हर रूप ही नारी तेरे समर्पण का प्रतीक है
हे नारी तेरे प्रेम के आगे नतमस्तक ये संदीप है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र










