
अब रुकने का नाम नहीं प्रिय, दुनिया की परवाह छोड़ दी,
लक्ष्य भेदना है अब मुझको, सफलता से नाता जोड़ लिया।
तकदीर पे रोना छोड़ दिया, जो छूट गया वो सपना था,
अब थाम लो हाथ तुम मेरा प्रिय, बस साथ तुम्हारा पाना था।
इच्छा है कि अपनी तकदीर, अब अपने हाथ से लिखूँगी,
ऊँचा हो नाम समाज में, अपना भाग्य खुद बुनूँगी।
सालों तक जिन जंजीरों में, खुद को धकेल कर रखा था,
बस पंख फैलाकर उड़ने दो, जो अब तक बस एक सपना था।
साहित्य का आँगन मिल गया, अब मैं नादान नहीं हूँ,
हर चौखट पार कर जाऊँगी, मैं अब बेजान नहीं हूँ।
मेरी लेखनी ही अब साथी है, मेरी लेखनी ही मुस्कान भी,
खुद को खो चुकी थी जो अब तक, अब पाना है पहचान वही।
मैं शिक्षिका थी अपनों की, पहले भाई-बहनों को सिखाया,
फिर माँ बनकर बच्चों को, जीवन का हर पाठ पढ़ाया।
जिम्मेदारी जब कंधों पर आई, तब खुद को पहचान सकी,
क्या नहीं आता था मुझे तब? जब ब्याह कर इस घर आई थी?
सब आता था, पर सदा मुझे, बस नीचा ही दिखाया गया,
अपनों की ही नजरों में, मुझे कमतर ही बताया गया।
एक औरत ही औरत की, उन्नति देख क्यों जलती है?
आज मैं लिखने लगी तो क्यों, सबकी साँसें उखड़ती हैं?
पूछते हैं सब— ‘ये हुनर भला, कहाँ छुपाकर रखा था?’
कैसे कहूँ इन सबको मैं, मेरा वजूद कहाँ सिमटा था।
तब मैं केवल बहू थी, पत्नी थी और भाभी थी,
रिश्तों की उन उलझनों में, घुटती एक माँ की छाती थी।
लिखती तो मैं तब भी थी, पर किसी ने मुझे देखा नहीं,
क्योंकि उनकी नजरों में बहू, बस एक मशीन थी… औरत नहीं।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)










