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पैसा कौन भगवान कौन

मेने शान्ति से पूछा तुम लोगों के दिमाग मे स्थायी क्यों नही होती
तपाक जवाब आया लोगों के दिमाग मे पहले ही इतना कचरा(विकार) भरा हुआ है मैं कहाँ अपनी जगह बनाऊं

विकारों की दुनियाँ मे शान्ति का स्थान भी अतिक्रमण की चपेट मे आ गया
भगवान बनने की अन्धी चाहत मे इन्सान हैवानों को भी खा गया

धरती पर अब इन्सान नही स्वयम्भू भगवानों का निवास हो गया है
खुद नही सुधरे दुनियाँ सुधारने का चस्का लग गया है

ताज्जुब इन्सान गलतियों का पुलिंदा है खुद इन्सान मानने को तैय्यार नही
परोपकार प्रेम प्यार अब आत्मिक नहीं व्यापारिक व्यवसायिक कारोबार के अलावा और कुछ नही

दण्डाधिकारी भी मनुष्य राजाधिराज भी मनुष्य
तू अदृश्य था शायद अब सदैव के वास्ते ही हो गया तू अदृश्य

इस दुनियाँ के तीन ही भगवान
पैसा दिमाग और छदम सम्मान

हम सही तुम गलत इसी की सदैव कलयुग मे लडाई है
इन्सान इन्सान को नासमझने की ही जग हंसाई है

छदम सम्मान की ही आग मे इन्सान को खुद को झुलसाने अमादा है
बरबाद इस संसार मे झुलसने का मसला ही एक दूजे से प्रतिस्पर्धात्मक कम ज्यादा है

काश इन्सान समझ पाता कि पैसे से बड़ी ही दुआ होती है
दिखता नही किन्तु दुनियाँ मे सदैव रब की ही सदा होती है

स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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