
माँ दुर्गा के नौ रूप हम सभी को भाते हैं।
ममतमयी माता रानी का आशीष पाते हैं।।
पर्वतराज हिमालय की शैलपुत्री की गाथा गाती हूँ।
तपस्विनी व विद्या की देवी ब्रह्मचारिणी को नवाती हूँ।।
चन्द्रघंटा की पूजा से शांति और निर्भयता पाती हूँ।
यश-वृद्धि करने वाली कूष्माण्डा को शीश झुकाती हूँ।।
कमल पर विराजमान न्यारी स्कंदमाता को रिझाती हूँ।
सिंह पर आरूढ़ कात्यायनी माता की धुन मैं गाती हूँ।।
भक्तों को सदैव फल देने वाली कालरात्रि को मनाती हूँ।
मन-मस्तिष्क के विकारों को दूर करके भजन सुनाती हूँ।।
नवदुर्गा की पूजा करते हुए नवरात्रि पर्व मनाती हूँ।
बड़े गर्व से माता रानी के नित दिन दर्शन पाती हूँ।।
नौ देवियों की पूजा-अर्चना करने देवालय भी जाती हूँ।
महागौरी और सिद्धिदात्री की आराधना में खो जाती हूँ।।
माँ दुर्गा के विशेष नौ स्वरूपों का महत्व मैंने बतलाया।
शेष बचे हुए जीवन में माता रानी का आशीर्वाद है पाया।।
माता रानी की सच्ची श्रद्धा व भक्ति का फ़र्ज़ निभाया।
सभी पूजनीय देवियों ने जगत्-कल्याण कर दिखाया।।
अंत में माता रानी के नौ रूप हमेशा मन में बसा कर रखें।
तन-मन के अद्भुत बल संग फिर धन से सेवा-भाव रखें।।
कवयित्री-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)












