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नवरात्रि में कलश स्थापना क्यों की जाती है


     नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि पवित्रता, शक्ति और दिव्यता का प्रतीक है। नवरात्रि हिंदू धर्म का एक बहुत ही पवित्र त्यौहार है।
   आईए जानते हैं कलश स्थापना

क्यों करते हैं–
कलश स्थापना इन मंत्रों के जाप से करना चाहिए —
“ओम भूर्भुवःस्व: हो वरुण, इहआगच्छए,इस तिष्ठ,स्थापयामि”
कलश स्थापना से संबंधित हमारे पुराणों में एक मान्यता है जिसमें कलश को भगवान विष्णु का रूप माना गया है। इसलिए लोग देवी की पूजा से पहले कलश का पूजन करते हैं। पूजा स्थान पर कलश की स्थापना करने से पहले उसे जगह को गंगाजल से पवित्र किया जाता है फिर पूजा में सभी देवी -देवताओं को आमंत्रित किया जाता है।
कलश विश्व ब्रह्मांड का, विराट ब्रह्म का भू -पिंड का प्रतीक है। इसे शांति और सृजन का संदेश वाहक कहा जाता है। संपूर्ण देवता कलश रूपी ब्रह्मांड में एक साथ समाहित हैं। वह एक हैं तथा एक ही शक्ति से संबंधित हैं। एक माध्यम में, एक ही केंद्र में समस्त देवताओं को देखने के लिए कलश की स्थापना की जाती है। वैदिक मंत्र के अनुसार कलश के मुख में विष्णु का निवास है, उसके कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं। कलश के मध्य में सभी मातृ शक्तियां निवास करती हैं। कलश में समस्त सागर, सप्त दीपों सहित, पृथ्वी, गायत्री ,सावित्री शांतिकारक तत्व, चारों वेद ,सभी देव आदित्य देव, विश्व देव सभी पितृदेव एक साथ सभी प्रसन्न होकर यज्ञ कर्म को सुचारू रूप से संचालक संचालित करने की शक्ति प्रदान करते हैं और निर्विघ्न यज्ञ कर्म को समाप्त करवा कर प्रसन्नता पूर्वक आशीर्वाद देते हैं।
कलश में पवित्र जल भरा रहता है। इसका मूल भाव यह है कि हमारा मन भी जल की तरह शीतल ,स्वच्छ एवं निर्मल बना रहे। हमारे शरीर रूपी पत्र हमेशा श्रद्धा,संवेदना, तरलता एवं सरलता से लबालब भरा रहे। इसमें क्रोध, मोह , ईर्ष्या, घृणा आदि की कुत्सित भावनाएं पनपने न पाएं।
अगर पनपे भी तो शीतलता से शांत होकर घुल कर निकल जाएं। कलश के ऊपर आम्र पत्र होता है जिसके ऊपर मिट्टी के पात्र में केसर से रंगा हुआ चावल रहता है जिसका भाव यह होता है कि परमात्मा यहां अवतरित होकर हमें अक्षत पंचतत्व की प्रकृति को शुद्ध करें। जीव विज्ञान को धारण करने वाली आत्मा अमर पत्र के समान हमेशा हरियाली युक्त रहे।
कलश में डाला जाने वाला दूर्वा, कुश,सुपारी, पुष्प इस भावना को दर्शाती है कि हमारी पात्रता में दूर्वा के समान जीवन शक्ति,कुश जैसी प्रखरता, सुपारी के समान गुण युक्त स्थिरता, फूल जैसा उल्लास एवं द्रव्य के समान सर्वग्राही गुण समाहित हो जाए।
“अस्मिन, कलशे वरुणं सांग सपरिवारं
सायुदधं सशक्तिकमा वाहयामि”

डॉ मीना कुमारी परिहार

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