
जब लगा कि कुछ भी नहीं है, वहीं से राह बनी,
टूटे ख्वाबों की राख से, फिर एक चाह बनी।
खामोशी ने जो घेरा, दिल को वीरान किया,
उसी सन्नाटे में छुपी, जीने की चाह बनी।
जो खो गया सफ़र में, वही सबक दे गया,
हर एक दर्द की लहर, नई एक राह बनी।
अंधेरों ने जब-जब भी, मुझको घेर लिया,
उन्हीं रातों की गोद में, नई सुबह पली।
ये अंत नहीं है दोस्त, बस ठहराव का पल,
इसी मोड़ से जीवन की, असली शुरुआत बनी।
आर एस लॉस्टम












