
लिपटकर साथ मेरे, मेरे ही कर्म बोलते है
डर हूँ तब मैं जाता ;जब ऑख खोलते है।।
तुमने देखा हुजूम मेरा ,सिर्फ प्रेम पाश वाला
लौटा है काल मेरा ;मेरा तब आज वाला।।
तुम्हे यकीं नही है शायद ; जब हालात बदलते है
लौट आता दिया सब ;जब ख़्याल बदलते है।।
बस रहता है तो खेल सिर्फ, वक्त का निराला
खर्च किया ही लौटता है; ब्याज साथ सरल आला।।
आह बेजुबान की न लेना; वो ख़्वाब बदलते है
देने को आ जो जाए ;तो जान तौलते है।।
तस्वीर के मुताबिक;ओ रंग भरने वाले
रंग बदल तुम न लेना ;यह तंज तेरे हवाले।।
कर्म गर हो कुछ तीखे ;तो नश्तर से सब चुभते है
रियायत नही भी कोई; कौन कैसे बींधते है।।
संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड ।।












