
जी चाहता है
घर के सारे आईने तोड़ दूं,
इनमें दिखता चेहरा
अब अपना सा नहीं लगता।
हर अक्स में
कुछ टूटा-सा, बिखरा-सा है,
जैसे मैं खुद से ही
कहीं दूर चला गया हूँ।
पर शायद आईने नहीं,
नज़र बदलनी होगी
क्योंकि सच ये है,
टूटा कुछ बाहर नहीं,
अंदर ही संभलना बाकी है।
जो बिखरा है,
उसी से फिर जुड़ना होगा,
आईने तोड़ने से नहीं,
खुद को जोड़ने से
नई शुरुआत होगी।
काश दिल को भी
बदल पाता कपड़ों की तरह,
जब जी चाहे उतार देता
ये भारी-सा एहसास।
नए रंग पहन लेता,
बिना किसी दाग़ के,
बिना यादों की सिलवटों के,
बिना टूटे ख़्वाबों के निशान।
पर ये दिल है
कपड़ा नहीं,
जो हर मौसम में
बस बदला जा सके।
इसे तो
हर दर्द के साथ जीना होता है,
हर टूटन से गुजरकर
खुद ही सिलना होता है।
शायद इसी लिए,
ये कभी पुराना नहीं होता
हर बार टूटकर भी
कुछ नया बना जाता है।
ये आँखें ही कसूरवार हैं
जो तुझे देखा था,
वरना दिल यूँ
बेख़बर-सा ही रहता।
एक झलक ने ही
कहानी बदल दी,
खामोश लम्हों में
हलचल-सी भर दी।
अब हर तरफ
तेरा ही अक्स है,
इन नज़रों ने ही
ये जादू किया था।
शिकायत भी इनसे,
और शुक्र भी इन्हीं का
इन्हीं ने तुझे दिखाया,
इन्हीं ने मुझे खोया था।
अगर मन चंचल नहीं होता,
तो तेरी यादें भी नहीं होती,
ये बेचैन धड़कनें यूँ
किसी के नाम नहीं होती।
सुकून शायद मिल जाता,
खामोशी भी पास होती,
पर इस दिल की दुनिया में
तेरी कोई बात नहीं होती।
ये मन ही तो है,
जो हर पल तुझे ढूंढता है,
वरना आँखों में यूँ
तेरी तस्वीर नहीं होती।
कसूर इसका भी नहीं,
ये तो बस अपना स्वभाव है
अगर मन चंचल नहीं होता,
तो ये मोहब्बत भी नहीं होती।
कसूर तो तेरा भी है,
तू इतनी ख़ूबसूरत क्यों है,
दिल यूँ ही बहक जाए
तू इतनी मासूम क्यों है।
तेरी एक झलक भर से
साँसें ठहर-सी जाती हैं,
नज़रें झुक भी जाएँ
पर तुझ तक ही जाती हैं।
क्या कहें इस दिल का हाल,
ये अब काबू में कहाँ रहता है,
तेरी हर एक अदा पर
बस खोता ही जाता है।
अब इल्ज़ाम किसे दें हम,
दिल को या तुझको कहें
कसूर तो तेरा भी है,
तू इतनी ख़ूबसूरत क्यों है।
आर एस लॉस्टम












