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हौसला हरगिज़ कम न मान

गिरा है तू अगर, तो हौसला हरगिज़ कम न मान,
अँधेरों में भी जलता है दिया, ये सच तू न मान।

कठिन राहों में रुक जाना, ज़रा सा ठहर भी ले,
मगर थक कर ये कह देना अब मुझसे कुछ भी न मान।

कभी हालात से हारा, कभी अपनों से टूटा दिल,
मगर खुद की ही नज़रों में खुद को तू कमतर न मान।

अगर दिल कह रहा तुझसे ये रास्ता सही नहीं,
तो बेखौफ़ मोड़ ले राहें, किसी का डर भी न मान।

ये जीवन है तेरा अपना, तुझे ही इसे गढ़ना है,
जहाँ तक जा सके तू जा, किसी की हद भी न मान।

ज़माना देखता रहता, कहानियाँ बनाता है,
मगर तू अपने फैसलों को किसी का क़र्ज़ भी न मान।

गिरा, संभला, फिर आगे बढ़—यही दस्तूर है जीवन,
जो हार को ही मान बैठे, उसे तू जीत भी न मान।

आर एस लॉस्टम

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