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इच्छामृत्यु हरीश राणा

‘हरीश’ नें की थी बात बहन से,
वो दिन था रक्षाबंधन का।
मात, पिता,भाई, बहना का,
दिवस था काला क्रंदन का।।

गिर गए चौथी मंजिल से,
कैसी मनहूस घड़ी थी वो।
परिवार पर इक अनचाही,
विपदा आन पड़ी थी जो।।

हालत हो गई स्थिर ‘हरीश’ की,
वो नहीं मरा, नां जिंदा था।
अब काल कोठरी सी काया में,
अटका जान परिंदा था।।

इक खास आस थी मैया की,
सुत, कभी तो, कुछ तो बोलेगा।
बाप सहज से सहलाता,
ये बदन कभी तो डोलेगा।।

तेरह सालों के दर्दों नें,
कुनबे को कष्ट अपार दिया।
धन,-दौलत, घर, जमीं सभी,
बेटे के ऊपर वार दिया।।

वो हार गए, सब टूट गए,
नहीं बची कोई युक्ति दाता।
दुआ मात-पिता, दे दो इसको,
अब पीड़ा से मुक्ति दाता।।

ऐतिहासिक प्रथम फैसला,
उच्चतम न्यायालय का आया।
दिलो-दिमाग से सोच समझ,
ये न्यायविदों नें फ़रमाया।।

फरियादी का दर्द समझ,
जज ने सबको हैरान किया।
‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ की,
अनुमति का ऐलान किया।।

कहर ढा दिया नियति ने,
क्यों ऐसा मंजर थोंप दिया।
दिल का टुकड़ा अपने हाथों,
आज ‘एम्स’ को सौंप दिया।।

जीवन रक्षक प्रणाली हटा,
इच्छा मृत्यु प्रबंध किया।
प्रकृति की गोद बिठा,
उसका तन-मन स्वच्छंद किया।।

कुछ लोगों के खातिर तो वो,
बन करके भगवान चला।
परिवार की इच्छा से,
कर अपने अंग दान चला।।

ए अंग-ग्रहिताओ कभी-कभी,
परिवार से भी बतला लेना।
है ‘हरीश’ तुम्हारी काया में,
जिंदा, इतना जतला देना।।

मांगी माफी सबसे उसने,
कर सबको वो माफ गया।
सौंप के जीवन, मृत्यु को,
वो मोक्ष का रास्ता नाप गया।।

     शिवराज सिंह चौहान 
               

 नान्धा, रेवाड़ी  
                         (हरियाणा)
             

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