
कौन दिया अधिकार उन्हें
विस्फोटक बरसाने को,
वसुधा के सीने को बारूद से
छलनी कर जाने को।
मानवता सारी कराह रही
और हम मौन खड़े हैं,
ज्ञान बांटने को दुनिया में
हम अब भी सब से बड़े हैं।
थर – थर कांप रही है धरती
विनाश की लीला देख कर,
शैतानी चाल चल रहा मानव
गोला बारूद फेंक कर।
सारी सभ्यता अर्जित की है
मानव का लहु बहाने को,
सत्ता ऐसी किस काम की
जो लगी है मिटने मिटाने को।
कवि संगम त्रिपाठी
जबलपुर मध्यप्रदेश










