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साहित्य समाज का दर्पण


— ओम कश्यप

साहित्य समाज का सच्चा आईना,
जिसमें दिखता हर रंग-नगीना।
कहीं हँसी की झिलमिल झांकी,
कहीं पीड़ा की गहरी पाती।

शब्दों में बसती जन-जन की धड़कन,
हर पंक्ति कहे जीवन का स्पंदन।
कलम जब सच का दीप जलाती,
अंधेरों में भी राह दिखाती।

कविता बनकर दर्द भी गाती,
मन की गांठों को खोल जाती।
कभी क्रांति की हुंकार बनती,
कभी प्रेम की फुहार बरसाती।

समाज की छाया, समाज का रूप,
साहित्य में दिखता हर स्वरूप।
जो देख न पाए आँखें खुली,
वह भी शब्दों में होती पूरी।

इसलिए कहें यह सदा निरंतर—
साहित्य समाज का है दर्पण

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