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परिधि

परिधि से से न थे बाहर
न ही कहीं सीमा अतिक्रमण हुआ
वही हुआ जो था परिधि मे
न ही
विधान की अवहेलना हुई
हमारे कर्णधार जो थे
न सोचा होगा तब उन्होंने
ऐसे कुतर्क जन-जन को दें गे कितनी ठेस
जिन का डर था
वो अब आ गए नए परिवेश
अति शिक्षित से क्या करें आशा
कल कैसे संभले गा देश
सिर्फ बची है सत्ता सुख की भूख
मुस्कुराते हुए कहें ये दरवेश
बस ! जन-जन को
ये देवें कुतर्कमय उपदेश।
आहट है … छिड़ जाएगा एक दिन नया क्लेश
ढूंढे से भी नहीं मिलता
चुप्पी में सह रहे सभी
नर्क के जीव यहां आ कर कुलबुलाते
कहने वालों का मुख कौन करे गा बंद
रंगे सियार
अपना नित्य रंग दिखाते
भारत माता के अश्रु को कौन पोछ पाते
उन से कैसी आशा
सुखों को भोग-भोग तृप्त न हो पाते।

      महेश शर्मा, करनाल

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