
विषय- माँ
विधा- कविता
रूको जरा कुछ पल माँ तुम,
मैं बचपन को याद करती हूँ।
माँ मैं तेरा दर्द समझती हूँ,
हाँ मैं तेरा दर्द समझती हूँ।
जन्म दिया तुमने हमको,
नौ महीने पेट में रखने पर।
तेरे उस पल के सपनो को,
मैंने महसूस किया उस पल।
ईश्वर ने माँ बनने का दिया वरदान मुझे जिस पल।
लगता है मुझे उन सपनो में,
नन्हे पग की आहट होगी।
ऐसे चलते ऐसे हँसते,
ऐसी शरारत करते होंगे।
जब मेरे इस घर के आँगन में,
मेरे अपने बच्चे होंगे।
मैं अब सब कुछ कर सकती हूँ।
रूको जरा कुछ पल माँ तुम,
मैं बचपन को याद करती हूँ।
हाँ मैं तेरा दर्द समझती हूँ।
वर्षों की कठिन तपस्या से,
ईश्वरीय सौग़ातों की वर्षा से।
दो नन्हें फूल खिले आँगन,
मिली मुक्ति बाँझ शब्द के तानो से।
दुनिया की दौलत झूठी,
मैं तो किस्मत वाली हूँ।
रूको जरा कुछ पल माँ तुम,
मैं बचपन को याद करती हूँ।
हाँ मैं तेरा दर्द समझती हूँ।
तू संस्कारों वाली जननी थी,
गलत काम से डरती थी।
वजह यहीं थी बस हर पल,
तू हमें डांट कर रखती थी।
साथ पिता का हर पल तुमने परछाई सा निभाया था।
बचपन से ईश्वर का साथ मिला,
बस ईश्वर का सानिध्य मिला।
माँ के संस्कार पिता की भक्ति
से जीवन में सम्मान मिला।
मैं खुद को धन्य समझती हूँ।
रूको जरा कुछ पल माँ तुम,
मैं बचपन को याद करती हूँ।
हाँ मैं तेरा दर्द समझती हूँ।
प्रेम बहुत था जीवन में,
नोक- झोंक मिठी लगती थी।
सारे रिश्तों में प्रेम भरा अपनी,
दुनिया जन्नत सी लगती थी।
माता- पिता के साये में,
जीवन की बागिया फली फूली।
उनका छोटा सा सपना था,
प्रेम पूर्ण संसार चले।
इन सपनो में खोये हुए,
पिता ईश्वर के प्रिय हुए।
माँ अब तू ही हमारी फूलवारी है
माँ तुझको नमन मैं करती हूँ।
रूको जरा कुछ पल माँ तुम,
मैं बचपन को याद करती हूँ।
हाँ मैं तेरा दर्द समझती हूँ।
माँ मैं तेरा दर्द समझती हूँ।
रचनाकार – श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)











