
प्रारम्भी नेह:-
तन पर चंदन ,हृदय में प्रकाश है।।
साधना ही जीवन का आभास है।।
शब्द नहीं, मौन में बोले जो राम।
उसकी दृष्टि में ब्रह्म का वास है।।
माया के बंधन तोड़ जो चलता ।
उसका हर कदम ही उपवास है।।
न धन का मोह, न मान की चाहत।
सहज जीवन ही उसका आकाश है।
दुख-सुख दोनों सम भाव से देखें।
उसका हृदय ही तीर्थ निवास है।।
नीलकंठ सा विष को पी जाए जो।
संसार को दे अमृत का कैलाश है।।
परिचयी नेह:-
अल्प भोजन, उत्तम विचार धारण करें
अर्तिका कहती यही योग का विकास है।।
पूर्णिकाचार्य
उमा शर्मा अर्तिका
नोएडा












