
यह बेजुबान ख़ामोशियां,
कभी ख़ामोश नहीं होती हैं।
कभी-कभी इन खामोशियों में
दिल की आवाज छुपी होती है।
ये खामोशियां,आंखों में उमड़ते भाव,
टपकते आंसुओं के जरिए, बहुत कुछ
कह जाती हैं, समझा जाती हैं।
खुशी दुःख,अप्रसन्नता, असहमति,
खामोशियां क्या नहीं समझा जाती!
मुश्किल यहां है कि खामोशियों की जुबान,
कहां समझ पाता है हर इंसान?
कोई विरला ही होता है इतना संवेदनशील,
जो समझे, बोले,खामोशियों की जुबान
हो अकील। आज साम्राज्य है
हर तरह के शोर का! बड़ी-बड़ी
बातों का,झूठे आश्वासनों के जोर का!
शोर “खामोशी” को हरा नहीं पाती है,
सुदृढ बेजुबान खामोशी सब कह जाती है।
सुलेखा चटर्जी भोपाल











