
किस सुख की करे कल्पना,जीवन होवे पूरा।
तृष्णा नित्य बढ़े मृग सम रहे सपन अधूरा।
इच्छाओं के संग बजे ये मन, ज्यूं बजे तंबूरा।
जग आया मिट्टी मिल जाना, काहे का सूरा।
हिय की सीमाओं के भीतर ही विचरे संतोष।
अपने अंतर ढूंढ मिले अगर मन तेरा निर्दोष।
जग इच्छाओं की दलदल नहीं तुझे है होश।
सर्वशक्तिमान समक्ष न टिके जोश-खरोश।
उस अनन्ता की ये सृष्टि, मंद है नर तेरी दृष्टि।
सौरमंडल में ग्रह ऊर्जा, धरा पे हो रश्मि वृष्टि।
जड़ जंगम को चलावे, तूं क्यूं स्वबल हर्षावे।
स्व भुज-बल जग सभ्यता का नाश दिखावे।
जिसको न मनः शांति वो स्वयं नर्ककीट सम।
हाहाकार में निद्रा उसकी भंग, पाले जो दंभ।
एक पल का भरोसा नहीं,कहे–हूं जग दबंग।
जग कर ले गा किनारा, जब धमके गा यम।
इच्छा को दे त्याग अनमोल जन्म हो बर्बाद।
इन इच्छाओं ने इस जग भडकाई है आग।
परम सत्य को पाने को जग जन्मा वैराग्य।
किये तूं ने पुण्य कर्म वो मिले तेरा सौभाग्य।
महेश शर्मा, करनाल











