
सितम मौसम के भी अजीब होते हैं
मौसम के बदलते मिजाज क्या खूब होते हैं
कभी हंसाते हैं ,तो कभी रुलाते हैं
सावन में बादल बरसाता
लोगों का मन हर्षित होता
वही फसल को भी बहा ले जाता
उसकी रात ठंड से हड्डी कंपाता
गरीब के लिए कहर है ढाता
जेठ की दुपहरी जब आग उगलती
मजदूर काम करके झुलस जाते
वही धूप किसी के छत पर
अचार सूखाने के काम है आती
पतझड़ में जब पत्ते हैं झड़ते
बगिया उदास -सा हो जाता है
फिर नई कोपल निकल आता है
वीडियो कॉल कर रही है
बसंत सबके लिए बासंती रंग है लाता
प्रकृति ने हमें अपनी सौगात है दिया
‘सितम मौसम का’ वह तो बस चक्र निभाती है
तो लिए हम मौसम से शिकवा शिकायत ना करें
मौसम के बदलते हर सितम को खुशियों से निभाएं और यूं ही मात दें
डॉ मीना कुमारी परिहार











