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मजदूर

जिनके कठोर परिश्रम से
बनती है गगनचुंबी इमारतें।
और बनते हैं शीश महल
जिनके परिश्रम की कहानी
कहती हैं हाथों पर पड़ी निशानी
दो वक्त की रोटी के लिए
जिनका परिश्रम सर्वोपरि है
वह जेठ की तपती हुई दोपहर में  कँपकँपाती शीत लहरी की ठंड में  
काम के प्रति पूर्ण समर्पित है
सपनों के महल बनाने वाला
खुद सड़कों पर थककर सोता है
प्रगति का कारीगर है मजदूर।
उन्नति का आधार है मजदूर।
असली राष्ट्र का निर्माता है मजदूर।

सांत्वना मिश्रा
नोएडा उत्तर प्रदेश

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