
यहाँ इंसान ही इंसान का अब तो शिकार है,
जुबां पर प्यार है लेकिन जिगर में ज़ख्म-ए-यार है।।
न दिल में कोई ज़ज्बा है, न आँखों में कोई सपना,
दिलों में नफ़रतें और लब पे झूठा इकरार है।।
सजाए फूल गुलदानों में हमने बस नुमाइश को,
महक गायब है और कहने को बस ये गुलज़ार है।।
मुखौटे ओढ़ कर सब घूमते हैं इस ज़माने में,
किसे पहचानिए हर शख़्स यहाँ अब तो उधार है।।
अंधेरे बाँटने निकले हैं जो सूरज के वारिस थे,
उजालों के शहर में अब लहू का कारोबार है।।
कोई समझे तो ये दुनिया महज़ इक ख़्वाब है प्यारो,
न समझे तो यहाँ बस आंसुओं का ही अंबार है।।
दिखावे की इस दुनिया में वफ़ा ढूँढूँ कहाँ मैं अब,
कहाँ सच्ची मोहब्बत का यहाँ अब एतबार है।।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश













