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डॉ धर्मवीर भारती प्रगतिशील लेखक

“चेक बुक हो पीली या लाल
दाम सिक्के हों या शोहरत
कह दो उनसे जो खरीदने आए हो
तुम्हें हर भूखा आदमी बिकाऊ नहीं होगा”
डॉ धर्मवीर भारती हिंदी साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर थे। डॉ धर्मवीर भारती आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे। वे एक समय के प्रख्यात साप्ताहिक पत्रिका “धर्मयुग “के प्रधान संपादक भी थे। डॉ धर्मवीर
भारती हिंदी के प्रसिद्ध प्रगतिशील लेखक थे। भारतीय धर्मवीर भारती को हिंदी साहित्य के सभी विधाओं में आदित्य सफलता प्राप्त हुई।
डॉ धर्मवीर भारती को 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनका उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’सदाबहार रचना मानी जाती है। धर्मवीर भारती का जन्म 25 सितंबर 1926 को इलाहाबाद में हुआ। इनके पिता का नाम चिरंजीव लाल वर्मा और मां का नाम चंदा देवी था।इलाहाबाद से ही उच्च शिक्षा पाई। विद्यार्थी जीवन से ही पत्रकारिता से जुड़े रहे, अध्यापन कार्य भी किया। ‘परिमल’ संस्था के साथ उनकी सक्रिय भूमिका रही।
डॉ धर्मवीर भारती जी को विविधता में रुचि थी। वे खुद रोमांटिक प्रकृति के होने के कारण प्रकृति ,सौंदर्य, फूल- पौधों के प्रति लगाव थी। प्रकृति प्रेम यह उनकी एक रुचि ही बन गई थी। यायावरी करना भारती जी का खास शौक था।
घूमना -फिरना और पढ़ना इन्हें प्रिय लगता था।
उनके काव्य संग्रह निम्नलिखित हैं:-
*दूसरा सप्तक’-इसमें 12 कविताएं संग्रहीत हैं।
*ठंडा लोहा’- ठंडा लोहा भारती जी की कविताओं का पहला संकलन है, जिसका प्रकाशन सन् 1952 में हुआ। इसमें 39 कविताएं संकलित हैं। इसमें प्रकृति प्रेम और युगबोध देखने को मिलता है।
कनुप्रिया’-यह भारती जी की बहुत चर्चित काव्यकृति सन 1956 में प्रकाशित हुई। इसमें राधा कृष्ण के प्रेम संवेदना की अभिव्यक्ति का वर्णन है। भारती जी उपन्यास के क्षेत्र में भी बहुत सफल रहे। ‘गुनाहों का देवता’-भारती जी की यह पहली औपन्यासिक कृति है, इसमें प्रणयानुभूति तथा प्रेम की अभिव्यक्ति का सुंदर वर्णन मिलता है।
*सूरत का सातवां घोड़ा’-गुनाहों के देवता के बाद डॉक्टर भारती का यह दूसरा उपन्यास सन 1952 में प्रकाशित हुआ है। इसमें समाज के पात्रों की अपेक्षा भारती जी ने समस्याओं पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है।
भारती जी कहानीकार के रूप में भी प्रख्यात रहे। भारती जी की कहानियों की पृष्ठभूमि का मुख्य आधार गरीबी एवं अभाव के चक्रव्यूह से जूझते, टूटते मनुष्य की सही-सही तस्वीर प्रस्तुत करना रहा है।
*मुर्दों का गांव,* स्वर्ग और पृथ्वी
*चांद और टूटे हुए लोग
*बंद गली का आखिरी मकान
भारती जी ने एकांकी भी लिखी है-
*नदी प्यासी थी,*नीली झील
आवाज का नीलामसंगमरमर पर एक रात
*सृष्टि का आखिरी आदमी
नाटककार भारती जी ने अंधा युग लिखा है।
भारती जी एक सफल पत्रकार भी थे, उन्होंने संपादक और सहसंपादक के रूप में भी कार्य किया है।
*संगम’यह साप्ताहिक पत्रिका थी इसका प्रकाशन 1947में हुआ था।
*निकष’यह 1954 में प्रकाशित, इसमें प्रयोगवाद का विवरण है।
*आलोचना’इसमें भारती जी ने सह संपादक का कार्य किया।
*धर्मयुग’हमेशा के लिए धर्मयुग के संपादक बन गए थे।
*हिंदी साहित्य कोश’संपादक के रूप में कार्य किया।
*अर्पित मेरी भावना’संपादक के रूप में कार्य किया।
इस प्रकार भारती जी का योगदान हिंदी साहित्य में विशिष्ट रहा है।
*रिपोर्ताज’–भारती जी रिपोर्ताज लेखन में भी पीछे नहीं थे। बांग्लादेश की यात्रा, चीन यात्रा पर भी रिपोर्ताज लिखा।
*यात्रा वर्णन-भारती जी की अभिरुचि ही थी यायावरी करना।
‘ठेले पर हिमालय’यह भारती जी की आधुनिक रचना है। यह यात्रा वर्णनों का संग्रह है, जिसमें भारती जी ने देश-विदेश की यात्राओं का वर्णन किया है। भारती जी ने जर्मनी 1968 में, इंडोनेशिया 1974 में, मॉरीशस सन 1978 में, और चीन1990 में
अमेरिका आदि विदेश यात्राएं की थी।
भारती जी ने साहित्य की बहुत सेवा की थी, उसके उपलक्ष में उन्हें जो सम्मान तथा पुरस्कार प्राप्त हुए हैं—
*1967 में संगीत नाटक अकादमी का सदस्य मनोनीत किया गया।
*1972 में उन्हें भारत सरकार द्वारा “पद्मश्री” के बहुमान से गौरवान्वित किया गया।
*सन 1988 में संगीत नाटक अकादमी का सर्वश्रेष्ठ नाट्य- लेखन पुरस्कार
*1990 में उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा”भारत भारती” पुरस्कार प्रदान किया गया।
डॉ धर्मवीर भारती जी ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के द्वारा आधुनिक हिंदी साहित्य में अपना एक निश्चित स्थान प्राप्त कर लिया है। साहित्य की हर विधा पर उनकी लेखनी चली है वो एक सफल साहित्यकार रहे। अनुवादक, शोधकर्ता, समीक्षक ,पत्रकार, संपादक के रूप में भारती जी हिंदी साहित्यकारों के अग्रिम पंक्तियों में उनका नाम प्रतिष्ठित हो चुका है। उनके जीवन की कई ऐसी घटनाएं हैं, जिनका प्रभाव उनके साहित्य पर पड़ा और उसे साहित्य में चिंतन और दृष्टि सदा रही।
इनकी पंक्तियां –‘उदास तुम से ‘
“तुम कितनी सुंदर लगती हो
जब तुम हो जाती होउदास
ज्यों किसी गुलाबी दुनियां में
सूने खंडहर के आसपास
मदभरी चांदनी जगती हो”

डॉ मीना कुमारी परिहार

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