
सुहाना जब से नामकरण कार्यक्रम से लौटी थी तब से उसके कानों में बस एक ही बात गूंज रही थी ,” बांझ क्या जाने पीड़ प्रसूति की” रह –रह कर उसकी आंखों में आंसू निकल आ रहे थे। घर का काम तो वो समेट रही थी लेकिन मन तो उसका अभी भी उन्हीं बातों में खोया था। वो उन सब बातों को सोचते हुए दूध गरम कर रही थी दूध कब ऊपर तक आ गया उसे पता भी नहीं चला,
अरे मम्मी दूध बाहर निकल जाएगा गैस तो बंद करो क्या सोच रहे हो जैसे ही ये आवाज कान में पड़ी उसने तुरंत गैस बंद किया।
सुहाना की बेटी लीजा : क्या हुआ मम्मी आप बहुत उदास लग रही हैं कुछ हुआ है क्या?
सुहाना: नहीं बच्चे कुछ नहीं बस वो फंक्शन में गई थी न तो थक गई हूं कुछ आराम करूंगी तो ठीक हो जाऊंगी।
लीजा: ठीक है मम्मी आप आराम करो मैं अपना होमवर्क पूरा कर लेती हूं।
सुहाना: हु बस इतना ही बोलती हैं।
सुहाना अपने कमरे में जाकर लेट जाती है लेकिन अभी भी वह दृश्य उसकी आंखों से हटा नहीं कि कैसे उसकी अपनी बुआ ने अपना नाती उसकी गोद में देने से मना कर दिया और जब सुहाना ने अपनी बहन का हालचाल पूछना चाहा तो उसकी बुआ ने ये कह कर उसे चुप करवा दिया कि तुम क्या जानो कि एक मां जब एक बच्चे को जन्म देती है तब उसे कितना दर्द सहन करना पड़ता हैं। बांझ क्या जाने पीड़ प्रसूति की।
एकबार फिर उसकी आंखों में आंसू निकल आए ।
वो अपनी सोच में इतनी खोई थी कि कब रेहान कमरे में आ गया उसे पता भी नहीं चला।
रेहान सुहाना का पति।
रेहान : क्या हुआ सुहाना तुम सोई हुई क्यों हो तबियत तो ठीक है वो उसके सर पर हाथ रखकर बोलता हैं।
अचानक रेहान के स्पर्श पाकर वो चौंक जाती हैं और झटके से उठकर बैठ जाती हैं।
रेहान: क्या हुआ सुहाना तुम रो क्यों रही हो ? आज तो तुम अपनी बुआ के यहां गई थी तुम अपनों से मिली थी तुम्हे तो खुश होना चाहिए तुम इतना उदास क्यों हों?
सुहाना झूठी मुस्कान चेहरे पर लाकर बोलती हैं ,नहीं कुछ नहीं हुआ , आप आओ में खाना लगाती हूं लीजा को भी बुला लो उसने भी नहीं खाया ।
रेहान : ओके
सुहाना लीजा और रेहान को खाना खिला रसोई समेटने लगती है तो लीजा बोलती है मम्मी आप खाना नहीं खाएंगी क्या ?.
सुहाना : नहीं मुझे भूख नहीं हैं।
रेहान : क्या हुआ है तुम आज इतनी उदास क्यों हो? कोई बात है क्या ? बोलो।
सुहाना का दिल तो कर रहा था कि जितना भी सैलाब उसके अंदर उमड़ रहा था वो बाहर निकाल दे लेकिन लीजा की तरफ देख वो बस इतना ही बोलती है नहीं कुछ नहीं हुआ आप लोग परेशान क्यों हो रहे हो ?
सुहाना कमरे में बस ये ही सोचती है हुई अपनी डायरी में लिखती हैं…..
बांझ की पीड़ा
लोग कितनी आसानी से ये बात बोल देते है कि बांझ क्या जाने पीड़ा प्रसूति की क्या कोई बांझ की पीड़ा जनता है क्या कोई उसके मन में उठती टीस को समझता है? मां नहीं बनाना कौनसी औरत चाहेगी?
कैसा होता होगा वो नो महीने का सफर कभी जी मचलना , कभी अपने ही कोख में पल रह बच्चे की हलचल महसूस करना कितना खुशी देने वाला होता होगा न वो पल लेकिन ये पल मेरे जैसी स्त्री को नसीब नहीं होता । दुनिया ने बहुत आविष्कार कर लिए लोगों की सोच में भी बदलाव आया है, अब तो बहुत से कृत्रिम उपयोग से बच्चे हो सकते हैं, लेकिन ये बांझ शब्द उपयोग में लाना बंद नहीं हुआ । बांझ…. कैसे लगता है ये सुनने में अगर एक बार सुन लो तो महीनों कानों में गूंजता रहता हैं। एक स्त्री में ममता के गुण हमेशा होते है चाहे वो मां बने या फिर नहीं।
सुहाना अपनी डायरी में लिख रही होती ही तभी रेहान कमरे में आता है उसकी आंखों में बह रहे आशुओं से उसे समझते देर नहीं लगती कि उसे किसी बात से बहुत तकलीफ पहुंची है, क्योंकि सुहाना एक सुलझी हुई समझदार स्त्री है छोटी छोटी बातों को दिल से लगाना उसकी आदत नहीं । रेहान समझ गया था कि चोट दिल पर लगी हैं। उसने धीरे से सुहाने के आंसू पोछे और बोला,” क्या हुआ किस बात से इतनी परेशान हो?”
सुहाना रेहान के प्यार भरा स्पर्श पाकर उसके दिल से लगकर फफक पड़ती हैं। मैं बांझ हूं इसमें मेरी क्या गलती बोलो रेहान लीजा को मैने जन्म नहीं दिया लेकिन क्या कभी मां की कमी महसूस होने दी उसे कभी इसे पता चला कि मैं उसकी मम्मी नहीं हूं।
रेहान: बस सुहाना बस तुमसे किसने कह दिया कि लीजा तुम्हारी बेटी नहीं है, तुम ही उसकी मां हो और कोई नहीं। और ये क्या बोल रही हो तुम ये जो शब्द तुमने अपने लिए बोला है अगर कभी दुबार बोला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। अरे तुम कैसे बांझ हो सकती हो जिसने 2 महीने की बच्ची को अपनी ममता की छांव में लिया उसे अपने आंचल के नीचे छुपाया, सुहाना बांझ तो वो स्त्री है जिसने फूल सी मेरी बच्ची को छोड़ चली गई अपने अरमान पूरे करने, अपने सपनों के राजकुमार के साथ उसके मन में एक बार भी अपनी बच्ची का ख्याल तक नहीं आया ।
अरे मां तो अपने बच्चे के लिए पानी जान तक की परवाह नहीं करती याद है तुम्हें की जब लीजा बीमार हुई थी कैसे तुमने अपनी सुदबुध खोकर उसका ख्याल रखा। खैर ये सब छोड़ो सबसे पहले मुझे ये बताओ कि ये बात तुम्हारे दिमाग में आई कहां से? किसने कहा तुमसे ये सब?
सुहाना ने सारी बात बताई कि कैसे उसकी बुआ ने अपने नाती को सुहाना को देखने नहीं दिया और अपनी बहन से हालचाल भी पूछने नहीं दिया।
रेहान लोग कह देते है कि प्रसूति की पीड़ा एक बांझ नहीं जानती तो मैं लोगों से पूछना चाहती हूं क्या आप एक बांझ की पीड़ा जानते हो? अरे प्रसूति की पीड़ा तो बच्चे के जन्म के साथ ही एक मां भूल जाती है लेकिन ये बाँझता की पीड़ा उम्र भर उसे सहनी पड़ती हैं। क्या कभी किसने मां नहीं बनने वाली औरत का मन टटोला बस हर जगह उसे ताने दे दिए जाते है वो बेचारी अपनी पीड़ा को साइड में रख दूसरे की खुशी में शामिल होने जाती है और उसकी चोट पर ऐसे हथौड़े मारे जाते है कि उसका घाव कई महीनों तक नहीं भरता।
रेहान: कह तो तुम सही रही हो लेकिन हम कितनों की सोच बदल सकते हैं तुम खुद को इतना मजबूत बना लो कि ये सब बाते तुम्हें तकलीफ नहीं दे पाए ओर तुम्हारे पास तो लीजा है तुम्हारी बच्ची।
सुहाना: अगर लीजा नहीं होती तो क्या तुम मुझसे इतना ही प्यार करते मेरी कमी को स्वीकार करते?
रेहान: ये कैसा सवाल है सुहाना? अगर लीजा नहीं होती तो भी मैं तुमसे इतना ही प्यार करता ओर आजकल मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है ।
तुम्हें पता है कल मां का फोन आया था वो बोली कि “सुहाना को कहना कि वो अपनी बुआ के यहां जाए तो कोई भी छोटी बात से अपना दिल नहीं दुखाए क्योंकि में उन लोगों को जानती हूं उनकी सोच आज भी वही हैं हम लोगों की सोच नहीं बदल सकते लेकिन खुद को मजबूत बना सकते है।”
सुहाना: रेहान मम्मीजी कितनी अच्छी है उन्होंने पहले से ये सब सोच लिया और तुमने मुझसे कहा क्यों नहीं?
रेहान: क्योंकि जाने से पहले ही मैं तुम्हारा मूड ऑफ नहीं करना चाहता था।
अच्छा अब ये बताओ क्या लिखा है आज इसमें वो सुहाना की डायरी लेते हुए बोलता हैं।
सुहाना: कुछ भी नहीं तुम्हें तो पता है मुझे मेरे मन के भावों को लिखने की आदत हैं । लेकिन तुम्हारे जैसा जीवन साथी हो तो मुझे बाते डायरी में लिखने की जरूरत भी नहीं पड़े। मैं बहुत लक्की हूं जो तुम मेरे जीवन में आये। अगर एक पति अपनी पत्नी का हर कदम पर साथ दे तो उसे किसी और की कभी कोई जरूरत नहीं रहती।
ये लोगों के ताने भी वो सहन कर लेती है जब उसका पति उसकी पीड़ा को समझे उसे प्यार से हौसला दे। तुम्हें पता है बहुत सी स्त्रियों को इस मामले में उनके पति का साथ नहीं मिलता क्योंकि बांझ तो एक स्त्री को कहा जाता है तो उसकी पीड़ा कैसे समझेगा।
बांझ की पीड़ा समझने के लिए पहले बंझता को स्वीकार करना पड़ता है। एक स्त्री को सब कह देते है लेकिन कभी ये सोचा कि एक स्त्री अगर मां नहीं बन पा रही तो एक आदमी भी तो पिता नहीं बन पा रहा ये तो भगवान के दिया एक वरदान है कि स्त्री अपने कोख में एक निर्माण को रचती हैं तभी तो वो जननी है। लेकिन इसका बीज तो एक जनक का ही होता हैं।
तो फिर सारे ताने एक स्त्री को ही क्यों?
रेहान मेरा बस चले तो मैं सबसे यही कहूंगी कि किसी भी स्त्री को उसके मां नहीं बनने के ताने मत मारो हां वो प्रसूति की पीड़ा से अनजान जरूर है लेकिन वो पीड़ा सहन करने के लिए उसके मन में कितनी उत्सुकता कितनी उम्मीद ये उसकी पीड़ा से हम सब अनजान हैं। इसलिए ये बांझ शब्द कभी किसी के लिए भूल से भी उपयोग नहीं करे कहने वाले तो कह कर भूल भी जाते है लेकिन सुनने वाले के कानों में महीनों गूंजते रहते हैं । एक बांझ की पीड़ा को भी समझिए।
रेहान: अरे वाह सुहाना कितनी अच्छी बात कही है ।एक काम करो तुम एम आर्टिकल लिखो इसपर तुम बहुत अच्छा लिख पाओगी ये मैं जानता हूं।
सुहाना : सच में..
रेहान: हां यार सच्ची ये जो बात तुमने अभी कही है ये वाकई बहुत अच्छी ओर लोगों तक पहुंचाने वाली है शायद तुम्हारे लिखने से सबकी सोच तो नहीं बदलेगी लेकिन क्या पता 100 में से किसी एक ही बदल जाएं।
सुहाना: तुम कितने अच्छे हो रेहान थैंक्यू भगवान जी मुझे रेहान जैसा जीवन साथी देने के लिए। I love you
जय माता जी की
विद्या बाहेती महेश्वरी राजस्थान









