
बिना किसी मुहूर्त के जन्म लेना,
जीवन भर मुहूर्त मुहूर्त करते रहना,
अन्त में बिना किसी मुहूर्त के ही,
संसार से सदा के लिए विदा होना।
यही फ़ितरत है हर इंसान के जीवन
और मृत्यु की, इसलिए सत्कर्म कर,
सारे ईर्ष्या द्वेष त्याग, मोह माया बिसार,
प्रेम व प्यार कर अनुराग, दया धर्म कर।
भक्ति अपने प्रभू के प्रति समर्पण भाव है,
मन में हमारे आस्था और पूर्ण विश्वास है,
उसकी शरण में ही हम सदा शांत,
सुचित्त, सुरक्षित एवं सदाचारी रहें।
संतुष्टि, तृप्ति, तटस्थता, सद्विचार,
अनन्त और आध्यात्मिक चेतना के
सुवासित पुष्प और उसकी कृपा
की फुहार हम सब पर बरसती रहे।
उसकी निर्मल भक्ति के भाव तले हम
एकचित्त हो बहुमूल्य जीवन जियें,
भक्ति का यह भाव और विश्वास हो,
अपना अलग अलग हो व्यक्तिगत हो।
भक्ति भाव के उपक्रम पूजा, जप हैं,
ध्यान, कीर्तन, निरंतर स्मरण चिंतन हैं,
मन में पवित्रता के भाव और सत्कर्म हैं,
इन भक्ति भावों से विरत क़र्म दुष्कर्म हैं।
किंतु केवल पूजन, ध्यान, स्मरण में
लगे रहना ही भक्त का लक्षण नहीं,
भक्त वह है, जो द्वेषरहित, दयालु हो,
सुख-दुख में अविचलित दृढ़प्रतिज्ञ हो।
अंतरवाह्य शुद्ध, सर्वारंभ परित्यागी,
चिंता व शोक से मुक्त कामनारहित,
शत्रु मित्र, मान अपमान, स्तुति निंदा,
सफलता असफलता में समभाव हो।
मननशील, हर परिस्थिति में खुश
रहने का स्वभाव, न किसी को कोई
कष्ट दे और वह किसी से असुविधा
या उद्वेग का स्वयं भी अनुभव ना करे।
भक्ति की इस राह पर बिना किसी
राग द्वेष के चलने वाला राही भक्त है,
आदित्य राम नाम जपना, पराया
माल अपना करने वाला भक्त नहीं है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ










