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श्रमवीर


हे श्रमवीर उठो, जागो ,आगे बढ़ो
निज पथ की ओर तुम नित,बढ़ो ,
मत देखो तुम मुड़कर पीछे कभी
तु श्रमवीर हो,बस सिर्फ आगे बढ़ो ।

तेरे ही भरोसे मे है,सारे,संसार ,
तु आलस मे आये तो,होगा सब बेकार,
रूक सी ही जायेगी,सबकी गति
मच जायेगी चहुंओर, यहाँ हाहाकार ।

तेरे फौलादी बाहें, मजबूत शरीर
कर्मशील हाथ,तु है धरा मे श्रमवीर,
नित तु सींचते हो,खीचते हो,ये पल,
संभाले रखे हो,तु ही ,मत हो अधीर ।

तु कमजोर ना मान खुद को,हे श्रमवीर
है तु शक्तिशाली बहुत, वज्र है तेरा शरीर
जिम्मे मे है,इस संसार के सारे काम,
बगैर तेरे ,सोचनीय विषय होगी गंभीर ।

समाज मे तेरा एक अलग ही ,है पहचान,
निम्न परिधान मे भी है,तु महान,
ऊंचे से नीचे घराने के लोग सारे,
इन्तेजार करते दिखते है,सुबह शाम ।

ऐसे मे तो ,बोलो श्रमवीर तु मन मे,
महान हस्ती की गर्व है न? तुझमे
फिर क्यो मन को छोटा कर ? हो दुखी मे
श्रमवीर का पद पाकर,जीयो इस धरा मे ।

चुन्नू साहा पाकुड झारखण्ड

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