
नदी के क्रोध में कितने ही ख़्वाब डूब गए,
न जाने कितने ही रिश्तों के जवाब डूब गए।
वो माँ थी सीने से अपने लगाकर नन्हे को,
उसी की बाँह में लिपटे हुए जनाब डूब गए।
न पूछिए कि ये मंजर कहाँ से गुज़रा है,
नदी की धार में कितने ही आफ़ताब डूब गए।
जो घर से निकले थे हँसते हुए सुबह बनकर,
वही तो शाम हुई, बनके अज़ाब डूब गए।
ये किसका दोष कहें, किसको हम पुकारें अब,
कि अपने हाथों के सारे ही गुलाब डूब गए।
दुआ यही है कि अब फिर न ऐसा दौर आए,
किसी की गोद में यूँ नन्हे जनाब डूब गए।
छाया शाह ‘सख्य’ मुंबई









