
विषय – अनजाने रास्ते
धुंधली सी पगडंडियाँ,
और दूर तक तन्हाई है,
लगता है जैसे ज़िंदगी,
पहली बार मुस्कुराई है।
न कोई पुरानी ज़ंजीर है,
न मंज़िल का कोई शोर,
बस मैं हूँ और ये रास्ते,
जो ले चले किसी ओर।
कभी पत्थरों से बातें की,
कभी काँटों से उलझ गए,
जो सुलझे हुए सवाल थे,
वो रास्तों में उलझ गए।
शहर की उस भीड़ से,
अब नाता टूट गया है,
अच्छा हुआ जो हाथों से,
वो नक्शा छूट गया है।
यहाँ वक़्त की पाबंदी नहीं,
न कल की कोई फ़िक्र है,
हवाओं के हर झोंके में,
बस आज ही का ज़िक्र है।
गिरना भी यहाँ मंज़ूर है,
संभलना भी एक कला है,
इस अनजानी सी राह में,
मेरा नया जन्म हुआ है।
अनजाने रास्ते… बुलाते हैं मुझे,
सिखाते हैं जो बातें, वो कौन कहे?
ये मुसाफिर अब ठहरने वाले नहीं,
मंज़िल के लिए, अनजाने रास्ते ही सही।
रीना पटले, शिक्षिका
शास हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला -सिवनी, मध्यप्रदेश












