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विरह का गहराव

सुनो, प्यार में तुम्हारे अब बदलाव हो रहा है,
धीरे-धीरे धुएं के छल्लों में ढलाव हो रहा है।
सूर्य की तरह बाहों में भरे थे कभी किरणों को,
दिनों-दिन इश्क के स्याह में गहराव हो रहा है।।

वो जो वादे किए थे तुमने साथ चलने के कभी,
अब उन रास्तों पर तन्हाई का घेराव हो रहा है।
तड़प रही है रूह मेरी विरह की इस अगन में,
जज्बातों की बस्ती में अब सिर्फ जलाव हो रहा है।।

सूख गई हैं आँखें राह तकते-तकते तेरी,
उम्मीदों की ज़मीन पर अब सूखाव हो रहा है।
कहाँ ढूँढूं वो सुकून जो तेरे पास होने में था,
अश्कों के समंदर में यादों का बहाव हो रहा है।।

रात की खामोशी अब शोर बनकर डराती है,
धड़कनों की लय में दर्द का जुड़ाव हो रहा है।
नसीब की लकीरों ने ऐसा मोड़ लिया ‘रजनी’,
कि मिलन की आस में अब बस झुकाव हो रहा है।।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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