
जब प्रेम-मधुरिमा मन की वीणा पर झंकृत हो जाएगी,
भावों की अनजानी सरिता अंतर्मन में बह जाएगी।
नयनों की चंचल पंखुरियों पर स्वप्न-सुगंध उतर आएगी,
तब लाज की अरुणिमा स्वयं कपोलों पर छा जाएगी।।
जब प्रिय-स्मृति का प्रथम स्पर्श हृदय-तरु को सहलाएगा,
मौन अधरों पर अनकहा कोई मधुर गीत मुस्कराएगा,
धड़कनों की मंद लहर भी मधु-संगीत सुनाएगी,
तब अधरों की कोमल रेखा लाली
से भर जाएगी।।
जब विरह-वेदना की बदली नभ-सी आँखों में घिर आएगी,
प्रिय के बिछोह की पीड़ा चुपके-चुपके मन बहलाएगी।
अश्रु-बिंदु बनकर स्मृतियां कपोलों पर ढुलक जाएंगी,
और व्याकुल प्राणों में केवल प्रिय-छवि रह जाएगी।।
जब स्वप्निल आलिंगन में प्रियतम का स्नेह समा जाएगा,
रोम-रोम में प्रेम-राग का मधुर स्पंदन छा जाएगा।
कानों में मानो वंशी का अमृत-स्वर गूंज उठेगा,
तब लाज-भरी अरुणाई फिर कपोलों पर खिल जाएगी।।
लाल चुनरिया ओढ़े जब नव-वधू द्वार सजाएगी,
चंद्र-किरण भी उसकी आभा देख स्वयं शरमाएगी।
सिंदूरी संध्या-सी शोभा मुखमंडल पर मुस्कराएंगी,
और प्रेम-दीप की ज्योति कपोलों पर झिलमिलाएगी।।
उमा शर्मा अर्तिका
नोएडा उत्तर प्रदेश













