
(मुक्त छंद)
अरावली की चोटियों पर
आज भी गूँजती है एक हुंकार—
“स्वाभिमान कभी झुकता नहीं।”
यह स्वर किसी साधारण राजा का नहीं,
मेवाड़ के सूर्य
महाराणा प्रताप का है।
कुंभलगढ़ की मिट्टी में पलकर
जिसने बचपन से ही
तलवार को खिलौना बनाया,
और मातृभूमि को
अपनी पहली पूजा।
राजसी वैभव ठुकराकर
वन-वन भटके,
घास की रोटियाँ खाईं,
पर अकबर की अधीनता का
एक कण भी स्वीकार न किया।
हल्दीघाटी की धरती
आज भी पीली नहीं,
बलिदानों के रक्त से
लाल दिखाई देती है।
जहाँ चेतक की टापों ने
वीरता का इतिहास लिखा था।
चेतक
सिर्फ एक घोड़ा नहीं था,
वह स्वामीभक्ति का अमर अध्याय था।
तीन पैरों पर भी
अपने राणा को सुरक्षित पार ले गया,
और फिर
मिट्टी की गोद में सो गया।
भामाशाह का त्याग,
झाला मान का बलिदान,
हकीम खान सूरी की निष्ठा—
सबने मिलकर
एक ऐसा दीप जलाया
जो आज भी राष्ट्रभक्ति में चमकता है।
राणा ने सिखाया—
राजा वह नहीं
जो महलों में सुख भोगे,
राजा वह है
जो प्रजा के सम्मान हेतु
अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे।
आज भी जब
स्वाभिमान पर संकट आता है,
भारत माँ के वीर पुत्र
महाराणा प्रताप को याद करते हैं।
उनका जीवन
एक युद्ध नहीं,
एक प्रेरणा है।
एक ऐसा संकल्प
जो कहता है—
“मिट जाना स्वीकार है,
पर मातृभूमि का मस्तक
कभी झुकने न पाए।”
शत-शत नमन
मेवाड़ के उस अमर सूर्य को,
जिसकी गाथा
युगों-युगों तक
वीरता का दीप जलाती रहेगी।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा’सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













