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गुरु वंदना,


बं दउं गुरु पद पदुम परागा,
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।
अमीअ मूरिमय चूरन चारू,
समन सकल भव रूज परिवारू। ।

सुकृति संभुतन विमल विभूति,
मंजुल मंगल मोद प्रसूती।
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी,
किएं तिलक गुन गन बस करनी।।

श्री गुरु पद नख मनि गन ज्योति
सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती।
दलन मोह तम सो स प्रकासु,
बड़े भाग उर आवइ जासु।।
उघरहिं विमल बिलोचन ही के,
मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।
सूझहिं राम चरित मनि मानिक,
गुपुत प्रकट जहं जो जेहि
खानिक।।
जथा सू अंजन अंजि दृग,
साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन,
भूतल भूरि निधान। ।
गुरु पद रज मृदु मंजूलुअंजन,
नयन अमिअ दृग दोष विभंजन।

मैं गुरु महाराज के चरणकमलों की रज की वंदना करता हूं,जो सुरुचि,
सुंदर स्वाद, सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से परिपूर्ण है।वह अमर ,,मूल ,
संजीवनी जडी का सुंदर चूर्ण है, जो संपूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है।

वह रज सुकृति, पुण्य वान
पुरूष, रूपी शिव जी के शरीर पर सुशोभित निर्मल विभूति है ,सुंदर कल्याण और आनंद की जननी है,
भक्त के मन रूपी सुंदर दर्पण के मेल को दूर करने वाली और तिलक करने से गुणों के समूह को वश में करने वाली है।

श्री गुरु महाराज के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाला है, वह जिसके हृदय में आ जाता है उसके बड़े भाग्य है।

उसके हृदय में आते ही हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं, और संसार रूपी रात्रि के दोष दुख मिट जाते हैं एवं श्री रामचरित्र रूपी मणिऔर माणिक्य गुप्त और प्रकट जहां जो जिस खान में है ,सब दिखाई पड़ने लगते हैं।
जैसे सिद्धांजल को नेतृ में लगाकर साधक सिद्ध और सूजान पर्वतों में वन और पृथ्वी के अंदर कोतुक से ही बहुत सी खाने देख लेते हैं।
श्री गुरु महाराज के चरणों की रज कोमल और सुंदर नय ना मृत अंजन है,

जो नेत्रों के दोशों का नाश करने वाला है।
,,,,गुरूवंदना,

राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर, मध्य प्रदेश

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