
विधा : आलेख
दिनांक : 8 मई , 2026
ईश्वर के द्वारा सृष्ट प्राणियों में मानव को विवेकशील प्राणी बनाया गया है , जिससे मनुष्य के रहते इस धरती पर किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न पहुॅंच सके । इसके लिए ईश्वर ने ही मानव के अंदर करुणा का भाव भरने के लिए संविधान का निर्माण किया , जिसमें अधिकार और कर्तव्य का पालन किया जा सके , ताकि मानव के अंदर मानवता जागृत हो और उसके मन में ' जियो और जीने दो ' का भाव समाहित हो सके ।
मानव एक विवेकशील , पारिवारिक एवं सामाजिक प्राणी है , जिसे एक पारिवारिक या सामाजिक सदस्य के रूप में एक सूत्र में बॅंध या बाॅंधकर चलना होता है ताकि हम पूरे समाज या राष्ट्र एक परिवार बनकर साथ साथ आगे बढ़ सकें ।
अन्य जंतुओं और मानव में यही अंतर होता है कि अन्य जंतु बच्चे को जन्म देने के कुछ दिनों या कुछ महीनों के बाद उसे त्याग देता है , किंतु मनुष्य होश संभालने के बाद आजीवन स्वयं को परिवार संग बाॅंधकर परिवार का भरण पोषण करते हुए अग्रसर होता रहता है ।
मानव विवेकशील प्राणी तो हुआ , उसके अंदर मानवता का गुण भी समाहित हुआ , किंतु उन गुणों के संग एक दुर्गुण भी समाहित हो जाने के कारण
मानव लोभ वश स्वार्थ में अंधे होकर अपना अधिकार तो याद रखता है किंतु अधिकार के साथ कर्तव्य भी होता यह भूल जाता है , जिसके कारण वह स्वयं मात खा जाता है ।
यों तो अधिकार और कर्तव्य में प्रथमत: अधिकार ही पहले लिखा जाता है , जबकि मानव जीवन के लिए प्रथमत: कर्तव्य का निर्वहन होना चाहिए , तत्पश्चात ही हम अधीकार के अधिकारी होते हैं । कर्तव्य नहीं तो अधिकार भी नगण्य हो जाता है , क्योंकि दोनों में ही अन्योन्याश्रय संबंध है । अर्थात दोनों ही एक दूसरे के बिन अधूरे हैं ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार













