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कौशल्या नंदन

विधा : कविता
हे कौशल्या नंदन ,
है तेरा अभिनंदन ,
तेरे कोमल चरणों ,
है सादर तुझे वंदन ।
हे कौशल्या नंदन ,
हे दशरथ के सुत ,
जैसे तुम दशरथ के ,
वैसे ही तेरे भी पूत ।
राजा जनक दामाद ,
नहीं इसमें है प्रमाद ,
नहीं तुममें है विवाद ,
नहीं तुममें अवसाद ।
तुम्हीं कहलाते राम ,
तुम्हीं हो सुख धाम ,
तुमसे ही उषाकिरण ,
तुम्हीं दुष्टों के शाम ।
जनकसुता सीतापति ,
तुम्हीं तो मति कुमति ,
तुमसे जीवन सार्थक ,
तुमसे जीवन दुर्गति ।

पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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