
शीर्षक : कितने रूप तेरे गिनाऊॅं
विधा : पद्य
कितने रूप तेरे माॅं गिनाऊॅं ,
हर रूप में तुझे ही मैं पाऊॅं ,
तुमसे लोक कहाॅं है वंचित ,
कैसे तुझको तजकर जाऊॅं ।
एक माॅं ने हमें जन्म दिया ,
एक माॅं जन्म बाद अपनाई ,
एक माॅं ज्ञान बुद्धि बढ़ाई ,
एक माॅं ने मति है सजाई ।
माॅं तुम भी किसी की बेटी ,
तुम भी किसी की बहन हो ,
तुम्हीं किसी की हो पत्नी ,
मातृ रूप चिंतन गहन हो ।
एक माॅं ने ही सृष्टि रचाई ,
एक माॅं होती विश्व स्वरूपा ,
एक दाग चंद्रमा भी लिया ,
पर माॅं है त्रैलोक्य अनूपा ।
माॅं से खाली कौन जगह है ,
माॅं हमारी तू कहाॅं नहीं है ,
तुम्हीं तो हो माॅं सर्वस्वरूपा ,
तेरे बिन संभव जहाॅं नहीं है ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













